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Monday, 13 June 2016

जे एन यू में राजकीय दमन (भाग 2)

फोटो दैनिक ट्रिब्यून से 

(पिछले भाग से आगे) 

इसके बावजूद दिनों दिन हमले बढ़ते गए. गृहमंत्री ने हमें हाफ़िज़ सईद से जोड़ा, किसी साध्वी ने हमारी फंडिंग को पाकिस्तान से आने वाला बताया, और हमारी जुबां काटने, हमें गोली मांगने की आवाजें मुख्यधारा के मीडिया में जगह पाने लगीं, (जो कन्हैया के भाषण के बाद तक जारी हैं). अचानक जे एन यू के छात्रों पर खर्च होने वाली सब्सिडी के आंकड़े बताये जाने लगे – देखो ये ‘हमारा’ पैसा है जिस पर ‘ये’ पढ़ते हैं. शायद यह सही मौका था कि कम फीस वाले आख़िरी केन्द्रीय विश्वविद्यालय की फीस भी बढ़वाई जा सकती है, ताकि गरीब, पिछड़े, दलित और दूर दराज़ से आने वाले छात्र न पढ़ पायें. उन्हीं के बच्चे महंगे और निजी विश्वविद्यालयों में जाएँ, जो ट्विटर और मीडिया का मानस बनाने की क्षमता रखते हैं, जिन्हें कम फीस खटकती है, और जो ये भूल जाते हैं कि टैक्स गरीब भी देते हैं और सब्सिडी उद्योगपतियों को भी मिलती है. वे टीवी के एंकर और खाए पिए विशेषज्ञ हमारे दुश्मन बन गए, जो यहाँ की राजनीति, बहस, और संवाद को या तो नहीं जानते थे, या उसे अपने लिए खतरा मानते थे.
रोज नए नए बयान आते थे, रोज़ नए नए छात्रों की ‘आतंकी प्रोफाइल’ बनायी जाती थी. बहुत से कम समझ वाले या कम पढ़े लिखे माँ बाप अपने बच्चों को फोन कर करके पूछते थे – ‘’क्या जे एन यू में बम बन रहा है?’’ आखिर ‘मास्टरमाइण्ड’ और ‘टेरर लिंक्स’ जैसी शब्दावली का यही असर होना था.

हमने अगले दिन मानव श्रृंखला बनायी, जिसमें फिर तीन हजार छात्र और शिक्षक जुटे, बार बार कहा गया कि नारों से सबकी सहमति नहीं है, लेकिन नारे राष्ट्रद्रोह नहीं है, हम आतंकवादी नहीं हैं. लेकिन नतीजा कुछ निकलता नहीं दिखता था. मीडिया और सरकार का दुश्चक्र तोडना नामुमकिन सा लग रहा था. सारा समय सर घूमता रहता, रात को नींद नहीं आती, एक दूसरे को मिलते समय छात्र यही पूछते ‘क्या हो रहा है?’ ‘अब आगे क्या होगा?’. सिर्फ एक ही जगह थोडा सुकून मिलता – उन सीढ़ियों के आगे, जहां पता लगता कि धीरे धीरे बाहर भी लोग हमारे समर्थन में बोलने लगे हैं, डर- डर कर ही सही. इसमें दूसरे विश्वविद्यालयों के छात्र और शिक्षक खुलकर सामने आये, जिन्हें पता था कि अगर इस हमले का विरोध नहीं किया गया तो कल उन पर भी दमन हो सकता है, इसके अलावा वे भी सामने आये जो पहले से ही सरकार और मीडिया के दमन से परेशान थे, अलग अलग रूपों में इसे झेल चुके थे. कुछ अखबारों में भी अन्य आवाजों को जगह मिलनी शुरू हुई, जिसमें दूसरा पक्ष लोग रख पा रहे थे.

इसके बाद बड़ा घटनाक्रम हुआ कि कन्हैया को अदालत में पेश किये जाने और सुनवाई को देखने गए लोगों, छात्रों और शिक्षकों पर काले कोट पहने लोगों और कुछ राजनैतिक कार्यकर्ताओं का भी हमला और मारपीट हुई, साथ में मीडियाकर्मियों पर भी. इससे हम और सदमे में पहुँच गए. आखिर अदालत में भी सुनवाई नहीं, वहाँ भी घूंसों की भाषा चलने लगी? पुलिस मूकदर्शक थी, वही पुलिस जो हमें राष्ट्रद्रोही ठहराने के लिए अदालती कार्यवाही से भी पहले बार बार मीडिया में बयान दे रही थी, सबूत हैं, केस सही है, आदि साबित करने में लगी हुई थी. जब तक इससे उबर पाते, अगले दिन फिर उन्हीं लोगों ने बिना किसी डर और पछतावे के कन्हैया को पीटा और एक बार फिर पुलिस इस पर कोई कार्यवाही करने में नाकाम रही और कार्यवाही करने की इच्छाशक्ति भी सरकार और पुलिस ने नहीं दिखाई. (बल्कि आज भी इस मामले में सारे आरोपी खुले घूम रहे हैं, उन्हें कोई बाधा नहीं है, ज्यादातर गिरफ्तार भी नहीं हुए) शायद सरकार और कट्टरपंथी ताकतों से जुड़े संगठनों के उकसावे पर रोज जे एन यू के मुख्य द्वार पर कई लोग झंडा लहराते जमा हो जाते, मुट्ठियाँ तानते, बैरिकेड लांघ कर अन्दर घुसने की धमकी देते, कैमरों पर चीख चीख कर नकली और उन्मादी राष्ट्रवाद का प्रदर्शन करते. गेट बंद रहता, अन्दर बसें नहीं आती जाती. यह गर्व का विषय हो चला था कि जे एन यू के तथाकथित देशद्रोहियों को मार देने, उखाड़ देने और देख लेने की धमकी दी जाए. इस माहौल में जीना सच में वही समझ सकता है जिसने यह झेला हो.
आखिरकार देश के कुछ लोगों को समझ में आने लगा कि जे एन यू के साथ हो रहा व्यवहार ठीक नहीं है, सामान्य नहीं है. लोकतंत्र और न्याय में मारपीट और मनमानी की छूट नहीं दी जा सकती. आवाजें बढीं और आखिरकार टीवी मीडिया में भी रविश कुमार के वापस आने के साथ एक आवाज़ तो आयी जो हमारा पक्ष भी देख पा रही थे. इस मारपीट को कोई भी सही ठहरा पाने में सक्षम नहीं था. अट्ठारह फरवरी को हिम्मत जुटाकर हम कैम्पस के बाहर निकले. (इससे पहले जे एन यू के खिलाफ दिल्ली में बेहद गंदा माहौल था, खुले आम जे एन यू का नाम सुनते ही ताने और धमकियां दी जाती थीं, जश्न – ए – रेख्ता नामक उर्दू के सरकारी कार्यक्रम में से दिल्ली पुलिस ने तीन छात्रों को सिर्फ इसलिए उठा लिया था क्यूंकि वो ‘जे एन यू जैसे दिखते थे – उनकी दाढी थी और उनके बैग से एक लाल झंडा निकला था’; और बहुत दबाव के बाद शाम को उनको ‘पूछताछ के बाद’ छोड़ा गया था. किराए पर बाहर रह रहे जे एन यू के कुछ छात्रों को मकान मालिकों ने घर खाली करने या पुलिस से फिर से वेरिफिकेशन करवाने को कहा था.) जब बाहर निकले तो देखा कि एक सैलाब सा आया, चार हज़ार छात्र कैम्पस से और करीब आठ दस हज़ार लोग बाहर से आये थे. हमने मंडी हाउस से संसद की तरफ कूच किया, टीवी चैनल वालों को गुलाब देकर उनकी सद्बुद्धि की कामना की गयी, अनेकों झंडे लहराए गए, जिनमें लाल, नीला और तिरंगा शामिल थे. हमने अपनी तख्तियों पर लिखा कि कन्हैया, उमर, अनिर्बान, आशुतोष, रमा या और भी कोई न तो देशद्रोही है, न आतंकवादी. हम छात्र हैं जो आपस में बहस करते हैं, जो देश और समाज के मुद्दों की समझ रखते हैं. जो रोहित वेमुला की मौत के कारणों को ख़त्म करना चाहते हैं, उस साज़िश को बेनकाब करना चाहते हैं. जो स्कालरशिप बंद करने के खिलाफ सड़क पर उतरते हैं. राजद्रोह की धारा अक्सर ऐसे ही लोगों पर लगाई जाती है जो सरकार के लिए असुविधाजनक सचों को बोलने लगते हैं. इसके बाद का आन्दोलन एक इतिहास सा है, बाकी छात्र भी निकलकर बाहर आये और अपने बयान या गिरफ्तारियां पुलिस को दीं. उनको कुछ भरोसा आया कि इस देश में न्याय होने की गुंजाइश अभी भी बाकी है क्यूंकि लोग गुंडागर्दी और तानाशाही के खिलाफ एकजुट हो सकते हैं. दो और बड़े जुलूस हुए, एक रोहित वेमुला के मुद्दे को जोड़ते हुए और एक कन्हैया की जमानत को लेकर.

अब हम रोज राष्ट्र और राष्ट्रवाद, इस देश के ज्वलंत मुद्दों, चाहे वो आर्थिक हों, राजनैतिक हों या सामजिक, सभी पर खुले आसमान के नीचे बहस करते हैं, वक्ताओं को बुलाते हैं, जिनमें अलग अलग धारा के लोग होते हैं, आपस में बहस भी होती है. हम यह कहना चाहते हैं कि हमारा राष्ट्र हम सभी का है, जिस पर बात करने  की भी जरूरत है, सरकार से और सत्ता से सवाल पूछने की भी जरूरत है. यही काम हम पहले भी कर रहे थे, जिसके कारण हम पर दमन हुआ है. कन्हैया की जमानत के बाद उसके भाषण को मजबूरी में सभी चैनलों और मीडिया को दिखाना पड़ा, क्यूंकि हमारी आवाज़ को नज़रंदाज़ करना नामुमकिन था. उस भाषण ने दिमागों पर जमे कोहरे को कुछ हद तक साफ़ किया है, हालांकि इस पूरे मामले में जे एन यू, छात्रों और छात्र राजनीति के प्रति पैदा की गयी घृणा को हटाने में शायद सालों की मेहनत लगेगी. बात साफ़ हो गयी कि सरकार और व्यवस्था की बुराइयों का विरोध करना, हर एक मुद्दे पर खुली बहस कर राय बनाना, अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता की बात करना आज के समय में इतना खतरनाक है कि आपको जेल में डाला जा सकता है, पीटा जा सकता है और बदनाम किया जा सकता है. हम जुलूस भी निकलते रहेंगे, इस लड़ाई को देश की बाकी लडाइयों से जोड़ा जायेगा, प्रतिरोध की एकता बनाने की कोशिश होगी.

हमारा संघर्ष तब तक चलेगा जब तक सभी साथी रिहा नहीं होते, सभी मुक़दमे वापस नहीं होते, विश्वविद्यालय से निलंबित छात्रों को ससम्मान वापस नहीं लिया जाता, उन अधिकारियों पर कार्यवाही नहीं होती जो हमारे नियमों पर चलने, साख बचाने के बजाय पुलिस और सत्ता के इशारों पर कार्यवाही कर रहे थे और बयान दे रहे थे. पुलिस, मीडिया के एक बड़े हिस्से और हमला करने वाले तथाकथित वकीलों – राजनेताओं पर भी कार्यवाही होनी चाहिए. यह भी स्पष्ट है कि एबीवीपी ने पहले से ही मीडिया को बुला लिया था और उनकी योजना जे एन यू प्रशासन के साथ मिलकर कुछ छात्रों पर दमन करवाने और विश्वविद्यालय के आंदोलित और प्रगतिशील चरित्र को ख़त्म करने की थी. यह नया नहीं है, ऍफ़टीआईआई, हैदराबाद केन्द्रीय विश्विद्यालय, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, अलीगढ़, चेन्नई आइआइटी.. यह सूची लम्बी होती जाती है. जहां से भी अन्याय, शिक्षा के बाजारीकरण और खात्मे, सरकार के छात्रविरोधी क़दमों पर आवाज़ उठी है, उसके जवाब में सरकार, सरकारी मशीनरी और सत्ताधारी पार्टी से जुड़े संगठनों ने अलग अलग बहानों से वहां हमले किये हैं.

मेरी व्यक्तिगत समझ इस आन्दोलन से और मजबूत हुई है, एक समूह के रूप में भी हम सब और परिपक्व हो गए हैं. इस आन्दोलन ने कैम्पस के ज्यादातर छात्रों का राजनीतिकरण किया है, यह शायद इससे पाया हुआ हमारा एकमात्र हासिल है. आखिर इस देश के सिर्फ 6% लोग ही उच्च शिक्षा संस्थानों तक पहुँच पाते हैं, यह हमारी एक प्रिविलेज (विशेष सुविधा) है. हम ही हैं जो न सिर्फ पढ़- लिखकर, बहस करके, सोचकर यह तय कर सकते हैं कि देश और समाज में क्या ठीक नहीं हो रहा है और उसे बेहतर कैसे किया जा सकता है. हम कठिन और नए सवालों पर बहस कर सकते हैं. सबसे महत्वपूर्ण यह है कि आगे चलकर हमारे ही कन्धों पर यह ज़िम्मेदारी है कि हम यहाँ से बाहर निकलने और देश के हर दबे- कुचले, गरीब, शोषित और संघर्षशील तबके के साथ खड़े हों, यह हमारी नैतिक और राजनैतिक जिम्मेदारी है. शिक्षा का मतलब अगर सिर्फ करियर और पैसा कमाना होता तो वह दुकानों में मिल सकती थी, वैसा ही आजकल चलन भी चल पडा है. शिक्षा का मकसद वास्तव में इस ज्ञान, सुविधाओं को हर एक तक पहुँचाना है, जो हमें मिला है; उसे समाज को लौटाना है, यह समझ अब हममें आ रही हैं.