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Friday, 6 August 2010

निठल्ले का आत्मावलोकन

क्या लिखूं, कि लिखने के लिए बहुत कुछ है और कुछ भी नहीं। पिछले एक साल से यह योजना बना रहा था कि कुछ लिखूंगा लेकिन लगता रहा कि लिखने के अलावा और भी बहुत काम हैं जमाने में, लेकिन अंततः ये लगा कि अगर २० साल की उम्र में ज़िंदगी में नोस्टाल्जिया सबसे अहम् पहलुओं में से एक हो जाए, तो लिखना मजबूरी है।
नाम की चोरी के लिए स्वर्गीय हरिशंकर परसाई से माफी मांग लेता हूँ। दरअसल वे मेरे पसंदीदा साहित्यकार हैं, और मुझे लगा कि मुझ निठल्ले के लिए निठल्ले की डायरी लिखना ही सही रहेगा।
आज का दिन भी अनेकों अनाम दिनों में से एक है, दिल्ली, जहाँ मै रहता हूँ, में बादलों और सूरज में प्रतियोगिता जारी है, उमस से जीना बेहाल है और बारिश जब होती है तो मानो शरमाई सकुचाई सी आते ही भागने की तैयारी में जुट जाती है। मैं यूनिवर्सिटी में आये नवागंतुकों के चेहरों को घूरता हुआ कमरे से निकलता हूँ, और रोज़ की तरह टहलता हुआ लाइब्रेरी पहुँच जाता हूँ अपने खालीपन की पुनर्हत्या करने। मुझे अपने शुरुआती दिनों की याद आती है, जब मै अकुलाए छौने सा कैम्पस में रगड़ता फिरता था, उस समय लगता था मानो अपनी आखों से हर चीज़ को हजम कर जाऊं, अब हर एक चीज़ पुरानी लगती है, हालाँकि चीज़ों के पुरानेपन में एक सांत्वना भी है, कि मैं अकेला ही पुराना नहीं हो रहा हूँ। क्लासेस अभी शुरू नहीं हुई हैं इसलिए निठल्लेपन का एहसास और बढ़ गया है। मेरे ख़याल से कुछ अति पढ़ाकुओं को छोड़ दें तो हमारी पीढी के सब छात्रों ने ये महसूस किया होगा, कि जब क्लासेस नहीं लगती तो उनकी कमी खलने लगती है, और जब लगती हैं तो काटने को दौडती हैं। कितनी ही बार कक्षा में बैठे हुए खिड़की से बाहर झांकते हुए मैंने अपने समय के अन्य सदुपयोग करने कि योजना बनाई है, लेकिन छुट्टियाँ आते ही सब हवा- हवाई हो जाता है।
खैर छोडिये जनाब हम निठल्ले ही भले हैं, क्योंकि निठल्लेपन में हरेक कामकाजी का मजाक उड़ाने और खिल्ली उड़ाने कि आजादी निहित होती है....