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Tuesday, 17 August 2010

जूतों का वर्ग चरित्र और छपा-छप.....

बरसात के मौसम में स्लीपर चप्पल फटकारते हुए चलने और अपनी पैंट के संपूर्ण पार्श्व-भाग तथा अगर ज्यादा जल्दी में हों तो शर्ट तक को कीचड के छीटों से आच्छादित कर देने वाले लोगों के प्रति मेरा विशेष मोह है, क्योंकि उन्हें मैं अपनी ही जमात का प्राणी समझता हूँ। बचपन से लेकर आज तक स्लीपर चप्पल हर दुःख-सुख में मेरी संगिनी रही है, कितनी ही बार जूते- सैंडल - फ्लोटर खरीदे गए लेकिन जो पहला प्यार स्लीपर से हुआ वो आज भी बरकरार है। सबसे बड़ी बात ये कि जब चाहा पहन ली जब चाहा उतार दी..(गौरतलब है कि उतार देने की इस आजादी ने बचपन में दर्जनों जोड़ी चप्पलें गुमवाई हैं, इधर नाचीज़ कंचे खेलने में मगन है उधर चप्पल किसी और की संगिनी बन चुकी होती थी... और धूल धक्कड़ में खेलते हुए चप्पल कहाँ छूट जाती थी.... पता नहीं और बाद में हर गली कूचे में ढूँढने पर भी नहीं मिलती थी)
आजकल तो "विश्वविद्यालय" का विद्यार्थी हूँ, यहाँ आदमी की पहचान जूतों से हर-एक तो नहीं लेकिन एक बड़ा तबका करता है, कुछ लोग तो जमीन की ओर देखते हुए चलते हैं और आप भ्रम में पड़ जाते हैं कि बड़ा ही विनम्र और 'हम्बल' किस्म का व्यक्ति है लेकिन असलियत में वो जूते नापते चलते हैं। जूते से आदमी की हैसियत, कुलीनता, अड्डों यहाँ तक कि राज्य का भी पता लगाना लोग जानते हैं। इस मामले में चचा शरलौक होम्स को भी इन्होंने पीछे छोड़ दिया है....
बीच-बीच में पढने में आता है कि बालीभूड-हालीभूड की फलानी अभिनेत्री के पास १०० जोड़ी या २०० जोड़ी पादुकाएं हैं, मन करता है उन्ही जूतों का हार बनाकर पहना दिया जाए॥ इधर हमारे प्रिय साहित्यकार मुंशी जी के फटे जूते इतने प्रसिद्ध हैं कि क्या किसी हिरोईनी- फिरोइनी के होंगे! उनपर दद्दा मुक्तिबोध, और हरिशंकर परसाई ने रचनाएं लिख मारी हैं...
और अगर आज के हिदी साहित्यकारों को प्रेमचंद से और कोई प्रेरणा लेने में असमर्थता हो,( जैसा कि लग रहा है) तो उनको चाहिए कि कम-अज-कम अपने जूते मोज़े फड़वा कर पहने और इस तरह एक नए क्रांतिकारी फैशन की शुरुआत करें।
मेरे पैरों को कभी जूते भाए ही नहीं, कुछ घंटों में ही अंगूठे अथवा छोटी उंगली का विद्रोह शुरू हो जाता है, और जब पर बाहर निकालो तो लोग स्ट्रेचर पर बेहोश मरीजों को लेकर आने लगते हैं... यहाँ तक कि यात्रा पर भी मैं स्लीपर ही पहन कर चला जाता हूँ, जिन्हें ट्रेन में चोरी कर लेने के प्रति लोगों के मन में कम उत्साह रहता है। शायद यही कारण है कि मेरी एडियाँ अक्सर फटी रहती हैं और मन में पराई पीर को जानने का घमंड घर कर गया है...
अब लोग चाहे बरसात के, दौड़ने के, घूमने के, नाचने के, पार्टियों के, योगा के, मंदिर के, शादी के, ट्रेन के, बाथरूम के, किचन के, बेडरूम के, लान के, और पैर छुआने के अलग अलग जूते पहनते हों, अपने लिए तो स्लीपर ही जिंदाबाद है (हालाँकि इधर कुछ दिनों से एक सेंडल लेकर आये हैं, लेकिन उतारने-पहनने में इतनी कोफ़्त होती है कि मत पूछिए॥)
इति श्री जूता पुराणं समाप्तम !!
जोहार !!