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Wednesday, 10 May 2017

रामपुरा -2, अतीत के आईने में

रामपुरा का जो चेहरा मेरे मन में उभरता है, वह सिर्फ अपने अनुभवों पर ही आधारित नहीं है. अपने परिवार वालों, दोस्तों, बड़ों से सुने और पढ़े पहलुओं का भी इसमें जुड़ाव है. अरावली के दक्षिणी छोर पर पहाड़ के नीचे बसा है यह क़स्बा. मध्यकाल में उत्तर-पश्चिम से दक्षिण की ओर आते कारवां यहाँ ठहरते थे, उस दौर की समृद्धि की कहानियाँ अब यहाँ के खँडहर बयान करते हैं.

लेकिन यहाँ का इतिहास तो उससे कहीं और पुराना है, ये इलाका मूल रूप से भीलों का रहा है, और उन्हीं में से एक सरदार, रामा भील ने इस गाँव को बसाया. बाद में जैसे- जैसे ताकतवर राजपूत और अन्य मैदानी जातियों का प्रभुत्व बढ़ा, भील पहाड के ऊपर के गाँवों की और खिसकते गए. आज रामपुरा में भील परिवारों की संख्या नगण्य है, पिछले साल आसपास के गाँवों में सर्वे करने पर पाया कि वहाँ भील सबसे गरीब और बुरी हालत में रहते हैं. किसी जमाने में जंगल और प्रकृति से जुडी जीवनशैली और स्वच्छंद प्रकृति के ये लोग, आज समाज के निचले पायदान पर हैं. जंगल बहुत कम हो गए हैं और वन विभाग के हाथ में हैं, खेती की ज़मीन इनके पास नहीं के बराबर है, मजदूरी कर जैसे तैसे अपना काम चलाते हैं. संस्कृति के स्तर पर भी इस इलाके में इनकी भाषा बहुत पहले विलुप्त हो गयी है और प्रकृति पूजन के रीति रिवाज, भगोरिया जैसे उत्सव अब कहीं नहीं हैं. आदिवासी जीवन का जो अहम् पहलू उल्लास और प्रकृति से नज़दीकी होता है, उसे भी मैं नहीं ढूंढ पाया.

ये एक सबक है, आदिवासी/प्रकृति आधारित लोगों को समाज, धर्म और व्यवस्था की ‘मुख्यधारा’ में लाने की बात करने वालों के लिए. स्कूल में मेरे साथ बंजारा जाति के लड़के भी थे, यह समाज भी अब आधुनिकता के बीच अपनी पहचान और जगह खोजने को संघर्षरत है. घुमक्कड़ और व्यापारिक जीवन आधुनिकता के साथ ख़त्म कर दिया गया है, ऐसे में पुलिस और बाकी समाज इन जैसी जातियों को नाहक ही अपराधी घोषित कर देते हैं, और कई बार हाशिये पर और विकल्पहीन होने के कारण वे उस तरफ धकेल भी दिए जाते हैं.

 खैर, समय के साथ रामपुरा एक बड़ा व्यापारिक केंद्र बन के उभरा और न केवल आसपास की उपजाऊ जमीन के कारण बल्कि, व्यापारिक पथ पर होने के कारण यहाँ की मंडियां खूब विकसित हुईं. आज भी यहाँ की गलियों के नाम इसकी गवाही देते हैं कि एक एक सामान के लिए एक पूरा बाज़ार निर्धारित था. तम्बाखू गली, श्रृंगार गली (बाद में नाम बिगड़ कर सिंघाड़ा गली हो गया), लालबाग, छोटा बाजार, बड़ा बाजार, धानमंडी जैसे मोहल्ले अब बस इतिहास के गवाह रह गए हैं. सिलावट (पारंपरिक रूप से राजमिस्त्री), बोहरा, बनियों, स्वर्णकारों की अपेक्षाकृत बड़ी संख्या भी दिखाती है कि व्यापार, निर्माण का बड़ा केंद्र होने से कारीगर और व्यापारी जातियां यहाँ जमा हुईं. सत्रहवी शताब्दी में रामपुरा का विकास एक बड़े व्यापारिक केंद्र के रूप में हुआ, जो अगली दो शताब्दियों तक कायम रहा. विभिन्न राजपूत राज्यों के एक मनसब/दीवानी रहते हुए बाद में यह इंदौर की होलकर रियासत के अधीन रहा जिन्हें यहाँ के दीवान भेंट/कर देते थे. रामपुरा के बड़े मंदिर होलकर काल के ही हैं, जिनमें प्रमुख कल्याणरावजी का मंदिर और जगदीश मंदिर हैं, मध्यकालीन स्थापत्य कला का उत्कृष्ट उदाहरण ये दोनों मंदिर आज भी स्थानीय लोगों की आस्था के केंद्र हैं. इसके अलावा रानी का महल (जिसमें उपतहसील कार्यालय हुआ करता था), दीवान साहब का महल, और किले के भग्नावशेष आज भी इतिहास के लिए एक रोमांच पैदा करते हैं.

मेरी पसंदीदा जगह है – पंच देवरिया, पांच मंदिरों का एक प्रांगण जो बड़े तालाब के किनारे एक शांत कोने में है, आज सभी मंदिरों पर घास और झाड़ियाँ उग रही हैं, दिन में भी यहाँ सन्नाटा पसरा रहता है, बड़े तालाब के अतिरिक्त पानी निकलने की जगह (चद्दर) इसके बाजू से गुजरती है उसी से यहाँ की बावडी में पानी आता है. स्कूल के दिनों में अक्सर मैं यहाँ भटका करता था. चद्दर के दूसरी ओर है एक विशालकाय खिरनी का पेड़ और दादावाडी, जैन मुनियों के ठहरने का स्थान. दिल्ली की धूल. शोर और भागमभाग के बीच अगर मुझसे कोई पूछे कि सुकून की तुम्हारी परिकल्पना क्या है, तो मुझे यही जगह याद आयेगी.

पहाड़ के ऊपर एक मंदिर है और एक मस्जिद, और तलहटी में रानी का महल, मेरा स्कूल और दूसरी तरफ दीवान साहब का महल और बड़ा तालाब. अक्सर स्कूली समय से ही मुझे लगता था कि रामपुरा इतना विविध, दिलचस्प और ऐतिहासिक है कि इसे पर्यटन स्थल बनाना चाहिए. अभी भी कितने ही दोस्तों को मैंने इसके बारे में बताया है, इसके फोटो दिखाकर ललचाया है.


लेकिन पिछले कुछ दिनों से कुछ और भी सोच रहा हूँ, अगर ये पर्यटन स्थल बन गया तो क्या ये नीरवता, शान्ति, सुकून कायम रह पायेगा? आकिर कौन सा ऐसा पर्यटन स्थल बचा है जहां कचरा, भीडभाड, व्यावसायीकरण, हो-हल्ला नहीं है. जहां हर अनुभव की एक कीमत न हो और जहां सब कुछ एक ढर्रे पर न चल पडा हो. हम भागभागकर शिमला या जयपुर पहुँचते हैं, हर जगह फोटो खिंचाते हैं और खाने से लेकर इतिहास के बनावटी अनुभवों को खरीदते हुए फिर दफ्तरी या दुकानी बोरियत में वापस घुस जाते हैं. हमारा किसी जगह से जीवंत, रोमांचक, रहस्यों और जिज्ञासाओं से भरा कोई रिश्ता शायद ही बनता हो. मैं चाहता हूँ कि रामपुरा के खँडहर बचें, उनका इतिहास खंगाला जाए, लेकिन साथ ही यह नहीं चाहता कि दुकानों और टूरिस्ट गाइडों का शोर, गाड़ियों का धुंआ, होटलों का दिखावटी वैभव रामपुरा को उसके अपने रहवासियों से ही छीन ले. बड़ी असंभव सी इच्छाएं हैं मेरी.
स्कूल के पास किले का बुर्ज और शहर का दृश्य 

पञ्च देवरिया 

पहाड़ से बड़े तालाब का दृश्य 

पहाड़ पर मस्जिद 

बड़े तालाब में पहाड़ की विहंगम परछाई 
 

Friday, 31 March 2017

रामपुरा – क्या भूलूँ क्या याद करूँ- 1


आदरणीय लक्कड़ सर 

अपना घर (पहली मंजिल पर)

जो उंगलियाँ गर्मी की छुट्टियों में अष्टा-चंगा-पै खेलने के लिए मचलती रहती थीं, आज की बोर्ड पर आकर ठहर गयी हैं. हमें उस खेल के लिए इमली के बीजे (चिंये) कभी कम नहीं पड़ते थे. वैसे मेरी दीदी इमलियों की दीवानी थी, एक बार में सौ ग्राम इमलियाँ खा डालती थी, इसीलिये दादी सीढ़ियों के नीचे वाली कोठरी में छुपा कर रखती थीं. ये कोठरी मेरे लिए एक रहस्यमयी तहखाने जैसी थी, अलग अलग तरह की मन ललचाती चीज़ें, इमलियाँ, खजूर, पापड़, कभी कभी मेवे, लेकिन साथ ही घुप्प अँधेरा और उसमे बंद रह जाने का डर. शायद जब मैं बहुत छोटा था चार – पांच साल का तब मुझे इसमें बंद कर दिए जाने की धमकियां भी मिली होंगी. रामपुरा का अपना घर वैसे इतनी भी प्राचीन बात नहीं है,
2007 तक चार साल रहा हूँ इसमें और 2008 में आख़िरी बार वहाँ सामान बाँधने में दादी की मदद की थी. लेकिन जब रामपुरा को याद करने बैठता हूँ तो सबसे पहले याद आती हैं गर्मी की छुट्टियाँ और वो विशाल, हवादार आंगनों, छतों और खिडकियों से भरा घर जहां मेरे दादा दादी ने 37 साल गुजारे, किराये पर.

भोपाल से एक बस चलती है, पहले मुख्य बस स्टैंड से चलती थी, अब लालघाटी से, ‘भोपाल- नीमच’. ये सुबह साढ़े सात बजे चलती है, और सबसे पहले आता है नरसिंहगढ़, जहां पहाडी चढ़कर संकरी गलियों में से गुजरकर बसस्टैंड आता है, किला भी दिखता है. फिर 
ब्यावरा, हाइवे का क़स्बा है. फिर राजगढ़, जहां मेरी दादी का मायका है और ढेरों रिश्तेदार हैं, दादी और पिता से सुनी कहानियाँ हैं, लेकिन उतरा एक ही बार हूँ, खिलचीपुर होते हुए फिर एक बजे आता है अकलेरा, जहां हम अक्सर आम खरीदा करते थे और मैं झूठी तसल्ली से भर जाता था कि आधा रास्ता कट गया अब जल्दी पहुंचेंगे. अचानक राजस्थान शुरू हो जाता है. झालावाड के बाद फिर अरावली में झूमते झामते, बबूल के पेड़ों और चट्टानों में से होकर भानपुरा आने के बाद रास्ता अथाह लगने लगता है. इस बीच मूंगफली आप खा चुके होते हैं और अखबार में विज्ञापन पढ़ चुके होते हैं. पसीने से तरबतर भीड़ चढ़ती उतरती रहती है, साफा बांधे बासाब और लुगड़ा पहने माँसाब कंडक्टर से बहस कर चुके होते हैं. गांधी सागर आने पर नज़ारा बदलता है और नदी की तरफ वाली खिड़की के लिए मन मचलता है. अंत में बेसला पहुँचते पहुँचते मन बस में नहीं रहता, मैं सड़क के मोड़ गिनने लगता हूँ, हम ये दोहराते हैं कि रामपुरा में मिलने वाले सिंघाड़े बेसला के तालाब से ही आते हैं. गांधी सागर के पानी में ढलती शाम की लाली झलकते हुए देखते हुए साढ़े छह बजे रामपूरा पहुँचते हैं. जहां बस स्टैंड पर ‘मधुशालाएँ’ खुली हुई हैं. इससे पहले कि आप मत्त हो उठें, ये गन्ने के रस की दुकाने हैं जहां शाम को टहलने के बाद लोग पहुँचते हैं. फिर एक ठेले पर सामान लादा जाता है और हम पहुँचते हैं 6, मोहिजपुरा, बड़ी बड़ी सीढियां चढ़कर पहली मंजिल पर जहां दादा दादी हमारा इंतज़ार कर रहे होते हैं.


रामपुरा पहुंचना आसान नहीं है, और रामपुरा से निकलना भी. अगर आप रामपुरा से निकल भी जाएँ तो रामपुरा आपके अन्दर से नहीं निकलता. अभी भी मेरी, दीदी की, बुआओं/ काका की जुबां अक्सर फिसल जाती है, हम कह पड़ते हैं कि रामपुरा जाना है. किसी भी ट्रेन से लगभग दो- तीन घंटे दूर और मुख्य लाइन के स्टेशनों जैसे रतलाम/कोटा से चार पांच घंटे दूर, हम अक्सर मजाक में कहा करते थे कि रामपुरा ‘खड्डे’ में है. ये खड्डा सिर्फ यातायात का नहीं था, अवसरों का भी था. सरकारी नौकरी में वहाँ रहे लोग नब्बे के दशक आते आते वहाँ से तबादला कराने को लालायित रहते थे, प्रमोशन, बच्चों के लिए प्राइवेट स्कूल, शौपिंग, अच्छा अस्पताल, ये सब वहाँ नहीं था. वहाँ था देशी पालक, शक्कर से मीठे सीताफल, खिरनी, सुनसान लेकिन अपनी सी लगती गलियाँ, एक तरफ पहाड़ और दूसरी तरफ विशाल जलराशि, अनगिनत मंदिर और मस्जिद और अनगिनत किस्से, जीवन के और जीवटता के.

अपवाद भी थे, दादाजी (डॉ रामप्रताप गुप्ता) और लक्कड़ साब (श्री अरविन्दकुमार जी लक्कड़, मेरे प्रधानाध्यापक) दो ऐसे ही अपवाद थे, कि इन्हें रामपुरा और रामपुरा को ये बहुत प्रिय हुए. तबादला होने पर लोगों ने बार बार रुकवा दिया. इनकी बदौलत रामपुरा का स्कूल और कॉलेज निजीकरण के साथ साथ सरकारी संस्थानों में आयी गिरावट को एक दो दशकों तक रोके रहे और कितने ही लोगों ने इनसे पढ़कर बहुत आगे तक का सफ़र तय किया. दादाजी 93 में रिटायर होकर भी और पंद्रह साल वहीं रहे और स्वास्थ्य, शिक्षा और पर्यावरण के क्षेत्र में काम करते रहे, उनकी बदौलत मैं रामपुरा में जितने लोगों को जानता हूँ उससे कई गुना लोग मुझे जानते हैं.

लक्कड़ सर के साथ पिछले साल एक सर्वे के दौरान बाज़ार में चलने का अनुभव हुआ, और ये महसूस किया कि एक अच्छा शिक्षक कितनी जिंदगियों को छूता है. मुझे ऐसा लगा कि उनके साथ चल पाना भी ऐसी उपलब्धि है जिसे मैं हासिल करने लायक नहीं हूँ. इन्होने कितने छात्रों को घर पर अलग से पढाया (जिसमें मैं भी शामिल हूँ), आर्थिक मदद दी, और अपनी डांट और छुपे हुए प्रेम से कितने ही छात्रों को ‘लाइन पर’ लाए. ये सरकारी स्कूल के ज्यादातर छात्रों का अनुभव रहा है कि 14 से 18 साल की उम्र तक हम सर से थर- थर कांपते हैं और बाद में उन्हें बेहद अपनेपन और आदर से याद करते हैं.