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Friday, 31 March 2017

रामपुरा – क्या भूलूँ क्या याद करूँ- 1


आदरणीय लक्कड़ सर 

अपना घर (पहली मंजिल पर)

जो उंगलियाँ गर्मी की छुट्टियों में अष्टा-चंगा-पै खेलने के लिए मचलती रहती थीं, आज की बोर्ड पर आकर ठहर गयी हैं. हमें उस खेल के लिए इमली के बीजे (चिंये) कभी कम नहीं पड़ते थे. वैसे मेरी दीदी इमलियों की दीवानी थी, एक बार में सौ ग्राम इमलियाँ खा डालती थी, इसीलिये दादी सीढ़ियों के नीचे वाली कोठरी में छुपा कर रखती थीं. ये कोठरी मेरे लिए एक रहस्यमयी तहखाने जैसी थी, अलग अलग तरह की मन ललचाती चीज़ें, इमलियाँ, खजूर, पापड़, कभी कभी मेवे, लेकिन साथ ही घुप्प अँधेरा और उसमे बंद रह जाने का डर. शायद जब मैं बहुत छोटा था चार – पांच साल का तब मुझे इसमें बंद कर दिए जाने की धमकियां भी मिली होंगी. रामपुरा का अपना घर वैसे इतनी भी प्राचीन बात नहीं है,
2007 तक चार साल रहा हूँ इसमें और 2008 में आख़िरी बार वहाँ सामान बाँधने में दादी की मदद की थी. लेकिन जब रामपुरा को याद करने बैठता हूँ तो सबसे पहले याद आती हैं गर्मी की छुट्टियाँ और वो विशाल, हवादार आंगनों, छतों और खिडकियों से भरा घर जहां मेरे दादा दादी ने 37 साल गुजारे, किराये पर.

भोपाल से एक बस चलती है, पहले मुख्य बस स्टैंड से चलती थी, अब लालघाटी से, ‘भोपाल- नीमच’. ये सुबह साढ़े सात बजे चलती है, और सबसे पहले आता है नरसिंहगढ़, जहां पहाडी चढ़कर संकरी गलियों में से गुजरकर बसस्टैंड आता है, किला भी दिखता है. फिर 
ब्यावरा, हाइवे का क़स्बा है. फिर राजगढ़, जहां मेरी दादी का मायका है और ढेरों रिश्तेदार हैं, दादी और पिता से सुनी कहानियाँ हैं, लेकिन उतरा एक ही बार हूँ, खिलचीपुर होते हुए फिर एक बजे आता है अकलेरा, जहां हम अक्सर आम खरीदा करते थे और मैं झूठी तसल्ली से भर जाता था कि आधा रास्ता कट गया अब जल्दी पहुंचेंगे. अचानक राजस्थान शुरू हो जाता है. झालावाड के बाद फिर अरावली में झूमते झामते, बबूल के पेड़ों और चट्टानों में से होकर भानपुरा आने के बाद रास्ता अथाह लगने लगता है. इस बीच मूंगफली आप खा चुके होते हैं और अखबार में विज्ञापन पढ़ चुके होते हैं. पसीने से तरबतर भीड़ चढ़ती उतरती रहती है, साफा बांधे बासाब और लुगड़ा पहने माँसाब कंडक्टर से बहस कर चुके होते हैं. गांधी सागर आने पर नज़ारा बदलता है और नदी की तरफ वाली खिड़की के लिए मन मचलता है. अंत में बेसला पहुँचते पहुँचते मन बस में नहीं रहता, मैं सड़क के मोड़ गिनने लगता हूँ, हम ये दोहराते हैं कि रामपुरा में मिलने वाले सिंघाड़े बेसला के तालाब से ही आते हैं. गांधी सागर के पानी में ढलती शाम की लाली झलकते हुए देखते हुए साढ़े छह बजे रामपूरा पहुँचते हैं. जहां बस स्टैंड पर ‘मधुशालाएँ’ खुली हुई हैं. इससे पहले कि आप मत्त हो उठें, ये गन्ने के रस की दुकाने हैं जहां शाम को टहलने के बाद लोग पहुँचते हैं. फिर एक ठेले पर सामान लादा जाता है और हम पहुँचते हैं 6, मोहिजपुरा, बड़ी बड़ी सीढियां चढ़कर पहली मंजिल पर जहां दादा दादी हमारा इंतज़ार कर रहे होते हैं.


रामपुरा पहुंचना आसान नहीं है, और रामपुरा से निकलना भी. अगर आप रामपुरा से निकल भी जाएँ तो रामपुरा आपके अन्दर से नहीं निकलता. अभी भी मेरी, दीदी की, बुआओं/ काका की जुबां अक्सर फिसल जाती है, हम कह पड़ते हैं कि रामपुरा जाना है. किसी भी ट्रेन से लगभग दो- तीन घंटे दूर और मुख्य लाइन के स्टेशनों जैसे रतलाम/कोटा से चार पांच घंटे दूर, हम अक्सर मजाक में कहा करते थे कि रामपुरा ‘खड्डे’ में है. ये खड्डा सिर्फ यातायात का नहीं था, अवसरों का भी था. सरकारी नौकरी में वहाँ रहे लोग नब्बे के दशक आते आते वहाँ से तबादला कराने को लालायित रहते थे, प्रमोशन, बच्चों के लिए प्राइवेट स्कूल, शौपिंग, अच्छा अस्पताल, ये सब वहाँ नहीं था. वहाँ था देशी पालक, शक्कर से मीठे सीताफल, खिरनी, सुनसान लेकिन अपनी सी लगती गलियाँ, एक तरफ पहाड़ और दूसरी तरफ विशाल जलराशि, अनगिनत मंदिर और मस्जिद और अनगिनत किस्से, जीवन के और जीवटता के.

अपवाद भी थे, दादाजी (डॉ रामप्रताप गुप्ता) और लक्कड़ साब (श्री अरविन्दकुमार जी लक्कड़, मेरे प्रधानाध्यापक) दो ऐसे ही अपवाद थे, कि इन्हें रामपुरा और रामपुरा को ये बहुत प्रिय हुए. तबादला होने पर लोगों ने बार बार रुकवा दिया. इनकी बदौलत रामपुरा का स्कूल और कॉलेज निजीकरण के साथ साथ सरकारी संस्थानों में आयी गिरावट को एक दो दशकों तक रोके रहे और कितने ही लोगों ने इनसे पढ़कर बहुत आगे तक का सफ़र तय किया. दादाजी 93 में रिटायर होकर भी और पंद्रह साल वहीं रहे और स्वास्थ्य, शिक्षा और पर्यावरण के क्षेत्र में काम करते रहे, उनकी बदौलत मैं रामपुरा में जितने लोगों को जानता हूँ उससे कई गुना लोग मुझे जानते हैं.

लक्कड़ सर के साथ पिछले साल एक सर्वे के दौरान बाज़ार में चलने का अनुभव हुआ, और ये महसूस किया कि एक अच्छा शिक्षक कितनी जिंदगियों को छूता है. मुझे ऐसा लगा कि उनके साथ चल पाना भी ऐसी उपलब्धि है जिसे मैं हासिल करने लायक नहीं हूँ. इन्होने कितने छात्रों को घर पर अलग से पढाया (जिसमें मैं भी शामिल हूँ), आर्थिक मदद दी, और अपनी डांट और छुपे हुए प्रेम से कितने ही छात्रों को ‘लाइन पर’ लाए. ये सरकारी स्कूल के ज्यादातर छात्रों का अनुभव रहा है कि 14 से 18 साल की उम्र तक हम सर से थर- थर कांपते हैं और बाद में उन्हें बेहद अपनेपन और आदर से याद करते हैं. 

Sunday, 3 April 2011

हाफ पैंट में जादुई यथार्थवाद



अप्रैल का महीना है, गाँव शहरों, सुनसान गलियों और व्यस्त बाज़ारों में फिर धूल उड़ने लगी है। उपमहाद्वीप की चार महीने की अभूतपूर्व गर्मी जल्द ही अपनी पूरी प्रचंडता के साथ आ पहुंचेगी। कैम्पस में बोगनवेलिया के फूल छाए हुए हैं और पेड़ों से गिरे पत्ते मुंह और बालों से उलझते फिरते हैं.. दोपहर को अब वही चिरपरिचित सन्नाटा चुपचाप आकर घेर लेता है, जो बचपन से ही हर गर्मी दिलो-दिमाग पर घर कर लेता है।
मैं अगर अब किसी दोपहर आँख बंद कर लूं तो मैं उसी धूल भरे गाँव के किसी घर में चुपचाप अपने आप से कंचे खेलता पाया जाऊंगा, जहां अधिकाँश माँ-बाप सो रहे हैं, और कुछ किसी कोने में बैठ कर चुप-चाप कुछ गप-शप कर रहे हैं। लू के साथ धूल के बवंडर उठाते हैं जो मिट्टी की दीवारों और नन्हे दरवाजों को हराकर घरों के अन्दर तक घुस जाते हैं। माँ-बाप की बाहर न जाने की सख्त हिदायत को जीवन का एक अभिन्न निंदनीय अंग मानते हुए चांडाल-चौकड़ी चुप-चाप बेआवाज़ घरों से बाहर निकल आती है, और फिर या तो पेड़ों से कैरी तोडना या फिर कंचे, पत्ते, छुपन-छुपाई, पिट्टू (सितौलिया) या कोई और खेल खेलना, यही परम धर्म है। और जब भोंपू की आवाज़ कानों तक पहुँचती तो फिर एक रुपये वाली पनीली तथाकथित 'कुल्फी' का अविराम सेवन करना, जिससे पीलिया और हैजा होने की अपार संभावनाएं जताई जाती हैं।
तब ये नहीं पता था कि इंसानी ज़िंदगी में इतने दांव-पेंच होते हैं। तब किसी शाम को यह संभावना नहीं होती थी कि आप इस पर विचार करें कि बोर्खेस में जादुई यथार्थवाद किस तरह परिलक्षित होता है। तब जादुई यथार्थवाद किताबों में खोजना नहीं पड़ता था, वह तो दैन्दिनी ज़िंदगी का हिस्सा था... जब गाँव से स्कूल की और चलते थे तो मुझे याद पड़ता है कि हम सभी जादुई यथार्थवाद के बहुत बड़े समर्थक और प्रचारक हुआ करते थे। (हालाँकि नोबेल कमेटी को हमारी प्रतिभा जानने में अभी वक़्त लगेगा) मुझे याद पड़ता है कि मैंने घर से स्कूल की ओर चलते हुए जादुई यथार्थवादी एक कहानी बनाई थी, जिसमें हमारे ही गाँव के एक लड़के को आंधी उड़ाकर एक किलोमीटर दूर ले गयी थी, और चूंकि उस प्रकार के बवंडर (भंगुरिया) का केंद्र एक भूत माना जाता था, अतः उसके बाद भूत और लड़के की बातों का विषद चित्रण और तत्पश्चात उस लड़के के छूटने का प्रसंग बताया गया था, और चूंकि कथा नायक एक जीता जागता लड़का था. (जो सौभाग्य से उस वक़्त गवाही देने के लिए उपलब्ध नहीं था) अतः हमारे साथी आलोचकों ने न केवल इस कथा पर पूरा विश्वास किया बल्कि उसे हाथों-हाथ लिया।
किस्से-कहानी इतने थे कि ख़त्म होने का नाम नहीं लेते थे और आज अगर याद करने बैठूं तो उन कहानियों की बहुत धुंधली सी ही याद है, विजयदान देथा जी की लोक-कथाओं से कुछ मिलती जुलती होती थीं वो। शायद अब भी जाकर गाँव में किसी अलाव के पास ठण्ड में बैठूं या गर्मी में किसी आम के पेड़ के नीचे, तो फिर उन्हें जी सकूंगा, लेकिन अब मेरा सिनिकल दिमाग शायद उन्हें एक वयस्क पढ़ी-लिखी नज़र से देखेगा। उनका साहित्यिक मूल्यांकन और तारीफ तो अब मैं कर सकता हूँ, लेकिन अब मैं विश्वास कैसे करूंगा कि धूप में बारिश होने पर लड़ैया(सियार) की शादी होती है...
अब जब कभी तालाब के किनारे बैठे हों और पुराने यार-दोस्त मिलते हैं तो यही बातें होती हैं रोजी-रोटी हालचाल की, उनमे से ज्यादातर अब मेहनत-काम धंधे से लग गए हैं, और अपन यूनिवर्सिटी में बैठकर किताबें चाट रहे हैं।
सोचता हूँ इस बार जब गर्मी में घर जाऊंगा तो जाकर जुगन दादा की डैम के पास वाली टपरिया में बैठकर जादुई यथार्थवाद पर विचार करूंगा, देखते हैं बोर्खेस और पप्पू भैया में से किसका पलड़ा भारी बैठता है....