Saturday, 19 March 2011

होली पर ऐंवें ही....



बने कविता नहीं अगर तो

लिखो ऊट-पटाँग

जो ज्ञान की बातें फांके

खींचो उसकी टांग

पढ़ा ज्ञान सब धरा रह गया

नहीं लगा कुछ हाथ

अब तू बैठा रह गया

झुका शर्म से माथ

रोना रोते रोते जब

भर जाये तालाब

तालाब में मच्छी पकड़ो

ऊँचे देखो ख्वाब

फूले सेमल टेसू फूले,

फूले अपनी तोंद,

झूले भंवरे फूलों ऊपर

भौंक सिपहिया भौंक

मुंह तो काला हो ही जाये

असमानी हों बाल

नाम ख़ाक रोशन करेंगे

अपने जैसे लाल

रंग गुलाल अबीर उड़े और

रहे नहीं कुछ होश,

अबकी होली ऐसे खेलो

हिरन और खरगोश...

सबको होली मुबारक !


चश्मे वाली फोटो अपनी है और दूसरी दोस्त की...

...

Friday, 25 February 2011

एक्झोटिक होने का सुख...


एक शब्दकोष से exotic का मतलब: : strikingly, excitingly, or mysteriously different or unusual
जब से महानगरीय जिन्दगी की छाया पड़ी है, जीवन कुछ ज्यादा ही फिल्मी लगने लगा है। क्लास जाते हुए लगता है मानों शहसवार मैदाने-जंग की ओर भारी कदमों से बढ़ रहा है, उसके मन में डर भी है लेकिन गर्व से सीना ताना हुआ है, आज कितने भी पिरोफेसर आ जायें, कित्ता भी मध्ययुगीन साहित्य सर पर लाद दिया जाए मैं कर्तव्यपालन से पीछे नहीं हटूंगा। कैम्पस में बेमतलब भटकते हुए लगता है कि सारे कवि-साहित्यकारों का जीवन आप खुद जी रहे हैं, और इसी बेमतलब रगड़ने से आदमी की दार्शनिकता का जन्म होता है, सार यह कि बोरियत दार्शनिकता की जननी है।
जिस दिन खाने में कढ़ी हो उस दिन शहीदाना अंदाज़ में ढाबों के आस-पास भटकते हुए लगता है कि जीवन कोई हंसी खेल नहीं..
परीक्षा के दिनों में तो सूरत वास्तव में योद्धाओं जैसी होती है, कोई जान पहचान वाला कुछ पूछे उससे पहले ही तड़ाक से कह दिया जाता है, कि भाई साहब परीक्छा चल रई हे अब बताओ का करें,कल जा बिसय को पेपर है, परसों बा बिसय को... ओर बा फलानी मेडम ने तो दिमागई खराब कर डारो... जित्ता पढाबे हे बासे डेढ़ गुना पूछेगी....
लेकिन सबसे ज्यादा जो असर या कहें कि विकृति आयी है वह है एक्झोटिक दृष्टि... एक्झोटिक दृष्टि से यह होता है कि आप अपनी आस-पास के नकली वातावरण को असलियत समझते हैं और ज़मीनी हकीकत को एक्झोटिक।
नतीजा ये कि बन्दा गाँव जाता है, तो सबसे पहले तो उसे पेड़ एक्झोटिक लगते हैं, फिर जानवर। खुदा ना खास्ता किसी गाय को दुहे जाते हुए देख लिया तो लोग कैमरा निकाल कर फोटो खींचने लगते हैं, अगर ठण्ड में अलाव दिख गया तो मध्यमवर्गीय मन खुशी से उछल उछल जाता है..और हालाँकि अपने महंगे कपड़ों की चिंता करते हुए उन्हें राख और चिंगारियों से बचाते हुए पसर तो नहीं पाता, लेकिन उकडूं बैठे बैठे ही किसी तरह हाथ सेंक कर वह अतीत में गोते लगाने लगता है... अगर गर्मी की रात हो और साफ़ आसमान, तो अचानक एक्झोटिक तारे नज़र आने लगते हैं, और 'हाउ क्यूट' कहते हुए लोग गालों पे हाथ रख लेते हैं...
ये तो हुई चीज़ों की बात, सबसे महान एक्झोटिक अनुभव लोगों को लोगों से बात करते हुए होता है। अगर खड़ी बोली के अलावा कोई बोली बोलने वाला कोई खालिस देहाती मिल गया तब तो हमारे नायक का दिल बल्लियों उछलने लगता है वह तोड़-मरोड़ कर उसी बोली में बे-सिरपैर के प्रश्न पूछने लगता है और मन में सोचता है कि वह एक महान युगपरिवर्तनकारी मानवशास्त्रीय-समाजशास्त्रीय (anthropoligical -sociological) प्रयोग का हिस्सा बन रहा है। लोगों को नदी में नहाना महान क्रांतिकारी काम लगता है, हालांकि दिशा-मैदान अगर जंगल में जाना पड़े तो प्रयोगधर्मिता की इतिश्री हो जाती है।
लेकिन कभी कभार मक्का की रोटी तोड़ते हुए अचानक तड़ित प्रहार की तरह नायक को समझ आता है, कि ये सब एक्झोटिक नहीं, मैं एक्झोटिक हूँ, मैं असामान्य हूँ, क्योंकि मैं जो अपनी सुरक्षित-सुविधासंपन्न आधुनिक ज़िंदगी जी रहा हूँ, ये खोखली है.... इसमें कोई महक नहीं है, कोई किस्से कहानी नहीं हैं, उल्लास नहीं है, यहाँ तक कि ज़िंदा होने का मतलब भी नहीं है, सब एक महान प्रपंच का हिस्सा है जो हम तथाकथित 'समझदारों' ने अपने मन-बहलाव के लिए गढ़ रखा है। प्रकृति 'एक्झोटिक' नहीं है, वह स्वाभाविक है, हम लोगों ने अपनी ज़िंदगी से प्रकृति और स्वाभाविकता को दोनों को गायब कर रखा है, इसलिए हमें exotic destinations की जरूरत पड़ती है। अगर हम अपने आप को प्रकृति और समाज से जोड़ कर देखेंगे तो सारी एक्झोटिकता पल में गायब हो जायेगी और अकल ठिकाने आ जायेगी..
(मैंने कहा था , बोरियत दार्शनिकता की जननी है, इस दार्शनिक पोस्ट से यह सिद्ध हो गया !)
आदतन फोटो गूगल इमेज से चुराया हुआ है..

Tuesday, 8 February 2011

सकल बन फूल रही सरसों..





अध्यात्म और मेरा हमेशा छत्तीस का आंकडा रहा है, कुछ का कहना है कि अभी तुम्हारी उम्र नहीं है समझने की। अपन को कुछ समय पहले तक तो कुछ भी पल्ले नहीं पड़ता था जब बात कुछ दार्शनिक और गहरी हो चली हो..यही कारण है कि उपन्यास छोड़ कर गिनी-चुनी चीजें ही पढ़ी हैं।
खैर वाकया यह है कि कुछ दोस्तों के साथ हजरत निज़ामुद्दीन की दरगाह जा पहुंचा परसों, वहाँ 'बसंत' मनाया जा रहा था। यह जानकारी फेसबुक से मिली.
इसके मनाने के पीछे कहानी यह है कि एक बार हजरत निजामुद्दीन अपने भतीजे कि मौत से गहरी उदासी और शोक में डूब गए ..न किसी से मिलते थे, न बात करते थे, न मुस्कुराते थे। यह देख कर अमीर खुसरो, उनके सबसे प्यारे मुरीद बहुत परेशान थे..इसी उधेड़बुन में कहीं जा रहे थे कि देखा कि कुछ औरतें चटख पीले कपडे पहने कुछ गीत गाती हुई जा रही थीं। खुसरो ने पड़ताल की तो पता चला कि यह बसंत मनाया जा रहा है।
अब खुसरो ने अपने प्यारे औलिया को मनाने के लिए अन्य मुरीदों के साथ वही बसन्ती बाना ओढा..और उन्ही गानों को अपनी तर्ज पर गाते हुए उदास संत के पास पहुंचे. जब महीनों से गम में डूबे हजरत ने अपने मुरीदों का ये लिबास देखा और उनके गाने सुने तो कई दिनों में पहली बार उनके चेहरे पर मुस्कान खिल उठी और उन्होंने अपने प्यारे शिष्य और दोस्त को गले लगा लिया।
वो दिन था और आज का दिन..हर साल बसंत पंचमी के मौके पर हजरत निज़ामुद्दीन औलिया के दीवाने सरसों के रंग का दुपट्टा ओढ़कर उनके दरबार में सरसों के फूल लेकर हाजिर होते हैं, और अपने दरवेश को बसन्ती गाने सुनाते हैं।
सूफी परंपरा को लेकर जो कुछ मालूम है, वह स्कूली किताबों के पन्नों से ही आया है, और ईश्वर की प्रेमिका-रूप में कल्पना-वन्दना, इश्क हकीकी और इश्क मजाजी, इंसानों की आपसी मोहब्बत पर जोर देना आदि बातें दिमाग में कुछ खाली शब्दों के रूप में ही मौजूद थी।
मन में कुछ बेजोड़ सूफी गायकी सुनने का लालच लिए पहली बार निजामुद्दीन दरगाह पहुंचा..एक संकरी गली से होते हुए दरगाह के बाहर पहुँचते ही, फूल चढ़ाइए, चादर चढ़ाइए, प्रसाद चढ़ाइए की आवाजें देते हुए दुकानदार दिखाई दिए। हर बड़े मंदिर, मस्जिद और मज़ार की तरह यहाँ भी श्रद्धा और आस्था के कारण कितने ही लोगों की आजीविका चलती है। एक बेंत की डलिया में फूल, प्रसाद और अगरबत्ती लिए हम तीन अन्दर पहुंचे। काफी लोग थे पर फिर भी वैसी घबरा देने वाली भीड़-भाड़ नहीं थी जैसी हो सकती थी। मैंने चुपचाप मत्था टेका, फूल चढ़ाए और एक धागा भी बांधा। लेकिन क्या माँगू ये समझ में नहीं आया... हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि....
बचपन से ही जब भी भूले-भटके मंदिर-मजार-गुरुद्वारे में घुसा तो हाथ जोड़ दिए, मत्था टेक दिया और कभी टीका भी लगवा लिया। सबसे अलग नज़र न आऊँ इसीलिए चुपचाप सर झुका लेता था ..प्रसाद का लालच भी रहता था। लेकिन मन में पक्का विश्वास कभी नहीं हुआ कि इस सब का अपने जीवन पर कोई प्रत्यक्ष असर होता भी है। हाईस्कूल में परीक्षा के दिनों में कसबे के बाहर बजरंग मंदिर पर भीड़ बढ़ जाती थी। इसी बहाने हवाखोरी और टहलना भी हो जाता था, दोस्तों के लिए एक प्लस पॉइंट ये भी था कि सहपाठिनें भी मंदिर आया करती थीं। अपन ने वहां नारियल भी फोड़े कई और आरती भी करवाई।
बहरहाल हम दरगाह के आँगन में जा बैठे और लोगों को देखने लगे, कुछ देर बाद मुरीद या कव्वाल दाखिल हुए और चटख सरसों के रंग के दुपट्टे बांटे गए जो ख़ास लोगों को ही दिए गए... कुछ बच्चे थे हाथ में सरसों के फूल लिए हुए। आदमी औरत सब इकठ्ठा थे, और गाना शुरू हुआ। पहले मज़ार के अन्दर और फिर बाहर करीब बीस कव्वालों ने समाँ बाँध दिया। इनमे पांच साल से लेकर पचास साल के कव्वाल शामिल थे। पता चला कि कच्ची उम्र से ही ये शागिर्द गाना सीखते हैं.
जब स्वर उठते थे तो मानों लहर सी आती थी, चूंकि एक ही पंक्ति को अलग अलग गायक आगे-पीछे दोहराते थे, खींचते थे और उससे खेलते थे। अपने आप हाथ ताल देने लगे और गर्दन झूमने लगी। अपनी तथाकथित बौद्धिकता हवा हो गयी...और मन मयूर बसन्ती ताल पर नाचने लगा...
लेकिन यह करीब दस पंद्रह मिनट ही चला, फिर वे खुसरो की मज़ार पर गए। खुसरो, जिसने 'हिन्दी' कविता और हिदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की नींव रखी और जो आज भी अपने हरदिल अज़ीज़ गुरु से कुछ गज दूरी पर ही लेटा हुआ है...
एक घंटे में कार्यक्रम ख़त्म हुआ, जिस दौरान फोटो भी खींचे गए और कुछ 'पहुंचे हुए' लोग भी पहुंचे थे। जब मैं खुसरो की कब्र पर सर नवा रहा था तो मैंने एक औरत को देखा जाली के पार रो रही थी..और 'मेरे ख्वाजा' को संबोधित कर अपने दर्द बयान कर रही थी।
मैं अपने मन में यही सोचता हुआ वापस अपनी आधुनिक दुनिया में लौटा, कि काश मुझे भी इतना विश्वास किसी पीर पर होता कि मैं अपनी पीर उससे बयाँ कर लेता।
सूफी मत का वह प्यार जो किसी अमूर्त के प्रति है, वह मानव-मात्र से प्रेम में बदल जाता है, और भाव-विह्वल कर देता है। क्या आस्था को सिर्फ अंधविश्वास, कर्मकांड और पाखण्ड से परिभाषित किया जा सकता है?

इससे ज्यादा गहरे जाऊंगा नहीं, अभी मेरी उम्र नहीं है.... :)
सकल बन फूल रही सरसों
(दोनों फोटो अपनी दोस्त के मोबाइल कैमरे के हैं)

Monday, 31 January 2011

प्रेम कविता



पिछली पोस्ट पर कुछ अपनों की ही लानत-मलामत आयी है, कि व्यंग्य लिखना ही है तो कुछ गहराई से लिखो, जिससे कुछ निकल कर आये. सोचने पर मुझे भी लगा कि मैंने कोई बहुत गंभीरतापूर्वक नहीं लिखा था, बस दिल की भड़ास निकाली थी. लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या ब्लॉग पर अपनी भड़ास नहीं निकाली जा सकती? सिर्फ इसलिए कि वह 'सार्वजनिक' मंच है. खैर अपन अभी कोई इत्ते तीसमारखां है भी नहीं कि किसी को फर्क पड़े, सो जो मन में आएगा लिखा करेंगे...
फिलहाल अपनी एकमात्र टूटी-फूटी नौसिखिया-नुमा प्रेम-कविता लगा रहा हूँ, जो करीब छह महीने पहले लिखी थी.

प्रेम कविता,
प्रेम कविता कैसे लिखूं?
कैसे करूँ बयाँ?
जो भरा है मन में, जो उमड़ आता है गले तक,
जो छलक आया है चेहरे पर, ज़िंदगी में,
कुछ लफ्ज़, कुछ पक्तियां,कुछ पृष्ठ,
या कुछ नहीं,
उपमाएं, रूपक
कुछ भी तो नहीं,
कोई गीत जो गुनगुना सकूं तुम्हे याद करते हुए,
लिख बैठूं कुछ ऐसा जो पहले न लिखा गया हो,
हमारे बीच जो कुछ है,
या अनुपस्थित है उसे आकार दूं.
उतार दूं कागज़ पर,
दूरियों और नजदीकियों के नक़्शे,
बस अब हार बैठा मैं,
फेंक कर कागज़ कलम,
कर ली हैं बंद आँखें
और तुम्हारा मुस्कुराता हुआ चेहरा सामने है,
कविता प्यार की न लिखी जायेगी आज.

Saturday, 29 January 2011

'यमुना तट पर लेनिनवा बंसी बजाए रे'

ये पोस्ट 'असुर' के लिए है, जिनके एक व्यंग्य गीत से इसका विचार उपजा.
सुबह जब रामभरोस काम पर जाने के पहले रोटी खा रहा था, तो उसकी औरत ने उससे पूछा..."सुनो, जे असली क्रांतिकारी कौन है?" रामभरोस ने अपने हाथ का कौर रोककर कहा अरे का बात करती हो? दूर लाल देश में लाल किताब में लिखे को जो लाल कोठी में बैठे-बैठे बांचत हैं, वही असली क्रांतिकारी हैंगे , इस पर सुमरती ने मुंह बिचकाया ओर कहा हटो..आप तो हर चीज़ को हलके-फुल्के में लेत हो..मेरी समझ में तो जो एकई जगह पर बैठ के पूरे देश-दुनिया की क्रान्ति को भविष्य बता दे वही क्रांतिकारी वास्तव में दमदार होत है. ओर हाँ सुनो ज़रा बाजार से आलू-प्याज लेते अइयो.., इस पर रामभरोस भड़क उठा, "अरे ओ क्रान्ति की अम्मा.. प्याज कहाँ से लाऊं? प्याज खरीदने जितनो बैंक बैलेंस नहीं है मेरो . तू खुद ही देख लइयो, जब खेत की तरफ जाएगी" . यह कहकर मन ही मन माओ का भजन करता हुआ वह मजदूरी करने चल पडा.
इधर सुमरती ने भी झटपट तगाड़ी उठाई...और 'यमुना तट पर लेनिनवा बंसी बजाए रे' गुनगुनाती हुई खेत को चली, रस्ते में उसे रामप्यारी मिल गयी, रामप्यारी ने बातों ही बातों में उससे पूछ लिया, कि द्वंदात्मक भौतिकवाद का जो त्रोत्स्कीवादी स्वरुप है उस पर उसके क्या विचार हैं, साथ ही बबलू के ताऊ की लम्बी बीमारी पर भी बात हुई, सुमरती ने पसीना पोंछते हुए कहा... 'देख री, मोहे गलत मत समझियो, पर जे त्रोत्स्की वाले लच्छन हमें कोई ठीक न लगत हैं, हम तो जेई कहें कि जा कछु वा बड़ी किताब में लिखौ है, बई होगो. अब होनी को कोई टार सकत है? अब तुमई बताओ, हमरी भूरी गैया २ किलो दूध देत थी, मगर हमने कितनो इलाज कराओ...पर बेचारी चल बसी'.... एक गहरी उसांस भर दोनों ने अपनी अपनी राह ली.
इधर भूरी, लखन, सुरेश और साबित्री क्रांति-क्रांति खेल रहे थे... इसी बीच भूरी ने लखन को धक्का देकर गिरा दिया, जिससे लखन गुस्से से आग-बबूला हो गया और बोला..-मेंहे तो पेले सेइ पता थो, कि तू प्रतिक्रांतिकारी बुर्जुआ जासूस हैगी .. तू पेटी बुर्जुआ भी है और तेरी नाक भी बह रही है. इस पर भूरी का भाई चमक कर बोला 'तू भी तो कुलक हैगो, निक्कर तो संभाल नई सकत, बड़ो आओ क्रांतिकारी' ! और इस तरह अचानक, क्रांतिकारी और बुर्जुआ ताकतों में संघर्ष छिड़ गया... गुलेल की नली से क्रांति निकलने को ही थी की माँ-बाप ने आकर उन्हें छुड़ाया...
और इस तरह महान क्रान्ति का एक और नया अध्याय लिखते लिखते रह गया.

Monday, 24 January 2011

एक सामाजिक मुलाक़ात

तुम खिसियाए से कुछ बात उठाते हो
और हम दोनों ठठाकर हंस पड़ते हैं
मैं अपनी कोहनी निहारता हूँ,
कान खुजाता हूँ,
पैर हिलाता हूँ,
पास बैठे अजनबी को घूरता हूँ
फिर डरते डरते तुम्हारी ओर देखता हूँ,
तब तक तुम्हे अगला चुटकुला याद आ गया है,
मैं राहत के साथ उसे लपक लेता हूँ
हम बारी बारी से मौसम को गलियाते हैं,
तुम खींसे निपोरते हो, मैं खिखियाता हूँ..
और हम बरसाती जमे पानी पर जमाई गयी
ईंटों की तरह कूद कूद कर बात-चीत में
आ गए असहज सन्नाटों को पार करते हैं..
फिर आखिरकार हमें वह ऐतिहासिक काम
याद आ जाता है, जो हमारी मदद के लिए
अरसे से कोने में छपा था...
और घड़ी देखते हुए हम विदा लेते हैं..
चाशनी सी मुस्कान लिए..
मैं पीछे मुड़कर देखता भी हूँ,
कभी कभी तुम्हारी परछाई को
और घर की ओर रपटते हुए सोचता हूँ
कि अगर प्याज की तरह हमारे छिलके उतर जाएँ
तो क्या हम दोनों एक दुसरे की गंध बर्दाश्त कर पाएंगे?

Saturday, 22 January 2011

आस

जश्न-ए-ज़िंदगी देखते हैं तमाशबीन की तरह,
और चुपचाप खिसक लेते हैं उस वीराने की ओर,
जहां छुपा कर रखे हैं कुछ सपने बड़े जतन से
और ढँक दी है तन्हाई की चादर बेरंगी सी..
जो वो हवा का काफिर झोंका आ निकला कभी
भूले भटके इस सूने दयार में भी,
उड़ा चादर ये सपने भी जवां होंगे
आसमाँ में खुले-आम बयाँ होंगे
और फिर हम भी इस यक-ब-यक खूबसूरत दुनिया में
बेघर नहीं बा-मकाँ होंगे.