Tuesday, 14 June 2011

कबिरा खडा बाजार में..

मेरे गाँव में हर रविवार हाट लगता है... या स्थानीय भाषा में 'बजार' भराता है। आस-पास के १०-१५ गाँव के लोग अपनी साप्ताहिक खरीददारी करने के लिए आते हैं, वैसे पूरे जिले में ही हफ्ते के अलग-अलग दिन अलग अलग गाँव के बजार के लिए तय हैं। मेरे गाँव केसला के आस-पास सुखतवा का बजार गुरूवार, साध्पुरा का सोमवार, भौंरा का शुक्रवार को पड़ता है।
जो इन बाजारों से परिचित न हो उसके लिए इनके रंग और गांववालों के लिए इनका मतलब समझना थोड़ा कठिन है। बहुत पुराने समय से ही बजार हमारे आदिवासी बहुल-क्षेत्र में सिर्फ खरीदने-बेचने से कुछ बढ़कर है... यह एक दिन है जब हमारे बाशिंदे अपनी रोज़ की मेहनत-मजूरी से हटकर अपनी ज़िंदगी में कुछ रंगों की तलाश में पैदल या साइकिल से बजार पहुँचते हैं... होशंगाबाद और बैतूल जिले की आदिवासी पट्टी के किसी भी बजार में आप जाएं तो नजारा एक सा होता है। रंग-बिरंगी पारंपरिक सोलह गज की साड़ियों में आदिवासी महिलाएं थैला लिए कुछ खरीदती, कुछ देखती हुई दिखाई दे जाएंगी, अधिकतर घर के सामान की खरीद महिलाएं ही करती हैं। (इस मामले में आदिवासी समाज अन्यों से अलग हैं जहां 'बाहर' का काम पुरूषों के हवाले और 'अन्दर' का महिलाओं के जिम्मे होता है) पुरुष भी, जिनमे आमतौर पर युवा लड़के ज्यादा होते हैं, अपने दोस्तों के कन्धों पर हाथ रखे चहलकदमी करते हैं।
जितनी दुकानें सब्जियों और अनाज की होती हैं, लगभग उतनी ही कपड़ों, और आईना, बिंदी, चूड़ी, रुमाल, कंघी,पिन, तेल, चप्पल, आदि की होती हैं... ये सभी दुकानदार एक बजार से दूसरे बजार घूम घूमकर अपना धंधा करते हैं।इनके आगे लटके रंग-बिरंगे रुमाल सहज ही ध्यान खींचते हैं(बुंदेलखंड-महाकौशल में लगभग हर मर्द के गले में एक गमछा-रुमाल जरूर होता है, जो तौलिये, चादर, पोटली, रस्सी, और सिर ढंकना आदि के बहुउपयोगी अवतार में इस्तेमाल होता है)
बजार के लिए लोग सज-सवंर कर तैयार होते, यह एक ख़ास मौक़ा होता है गाँव के जीवन में. मुझे आज भी याद है कि रविवार दोपहर हम सब नहा-धोकर सिर में खूब सारा खोपरे का तेल चुपड़ कर साबुत कपडे पहन कर बजार जाने के लिए तैयार हुआ करते थे, (हम में से ज्यादातर के पास केवल एक जोड़ी साबुत-फिट बैठने वाले कपडे थे-स्कूल की यूनिफार्म, आज भी स्थिति कुछ ज्यादा बदली नहीं है) खाकी पैंट और सफ़ेद शर्ट से सुसज्जित चार पांच नन्हे हीरो अकड़ कर निकलते थे, अपने उन छोटे भाई बहनों की तरफ गर्व से देखते, जो अभी बजार जाने की उम्र के नहीं थे। बजार में अलग-अलग चीज़ों की दुकानों को जी भर के देखने के बाद हम पैसे मिलाते और ४-५ रुपये का नमकीन खरीद कर खाते। उसके बाद धुंधलके में धीरे-धीरे गाँव की ओर चल पड़ते, रस्ते में गाँव के लोग मिलते, कुछ हंसी मजाक होता (आजकर ज्यादा हंसी मजाक मेरे विशाल डील-डौल पर होता है) और दिन ढलते सब घर पहुँचते, जहाँ बच्चे सबसे पहले झोलों पर झपटते, जहां नमकीन, जलेबी या कोई और चीज़ उनके लिए रखी होती। मजदूरी के पैसे भी बजार के ही दिन मिलते हैं। गाँव के लोग अपनी वनोपज वगैरह बेचने के लिए लाते हैं और बदले में अपनी जरूरत का सामान ले जाते हैं।
बजार में आस-पड़ोस के गाँव के लोग मिलते हैं, महिलाएं एक तरफ खड़े होकर घर-परिवार की, गाँव की बातें करती हैं, दुःख और सुख साझा किये जाते हैं। इनमे से ज्यादातर गाँवों में किराने की दुकानें नहीं होती थी, इसलिए बजार एक तरह से "बाजार" की उनके जीवन पर एकमात्र दस्तक थी जिनकी ज्यादातर जरूरतें खेत और जंगल पूरा किया करते थे। लालमिर्च, मसाले, कनकी(चावल की चूरी) और कुछ सब्जियां लोगों के झोलों में झाँकने पर दिख जाएंगे। बजार में ही आदिवासी युवक-युवतियों के माँ-बाप उन्हें एक-दूसरे से मिलाने के लिए लाते हैं, सम्भावित रिश्ता पक्का होने से पहले। चूंकि आदिवासी समाज में प्रेम-विवाह भी प्रतिबंधित नहीं है हालांकि उन्हें प्रोत्साहित नहीं किया जाता, इसलिए अनेक प्रेम-कथाओं का जन्म भी बाजारों में हुआ है॥
अपनने बहुत पहले से घर की सब्जी लाने का जिम्मा उठा लिया था, इसलिए आज भी छुट्टियों के दौरान बजार जरूर जाते हैं, और आते-जाते चेहरों में कोई परिचित चेहरा ढूंढते रहते हैं। सब्जियों के बढ़ते दामों को कोसते-कोसते अक्सर ही कोई छठी-सातवीं का सहपाठी मिल जाता है, जिसके चेहरे को ध्यान से देखने पर नाम याद आ जाता है। हाल-चाल पूछने के बाद थोड़ी देर उन दिनों को याद करते हैं जब दोनों निक्कर पहने दुनिया भर की हांका करते थे और यह महसूस कर अजीब लगता है कि अब जब दुनिया देखने के दिन आये हैं तो हांकने के लिए कुछ मिल नहीं रहा है।
पिछले बजार किरार सर मिल गए थे, जो हमारे मिडिल स्कूल में अपने सवा पाव के हाथ के जोर पर गधों को घोड़ों में बदलने की घुडसाल आज भी चलाया करते हैं, सर ने ये उम्मीद जाहिर की कि अपन उनका नाम रोशन करेंगे, (अपन को स्वयं प्रकाश की एक कहानी याद आ गयी, जिसमे एक बच्चा सोचता है कि वो अपने बाप के नाम का बोर्ड लगवा कर उस पर रंग-बिरंगे बल्ब लगवा देगा) अपन ने एक विनम्र मुस्कान से काम चलाया।
बजार भी बदल रहे हैं, दुनिया भी बदल रही है, उम्मीदें लम्बी चौड़ी हो रही हैं और अपन १० रुपये के सवा किलो टमाटर खरीदकर खुल्ले पैसों के लिए बहस कर रहे हैं...

Monday, 30 May 2011

न लिख पाने के खिलाफ/ ग्रेट एक्सपेक्टेशन्स

यह तो बड़ी ही अजीब बात मानी जाएगी कि ज़िंदगी में बिना कुछ ज्यादा लिखे हुए ही 'राइटर्स ब्लोंक' हो जाए। दरअसल असल कारण राइटर्स ब्लोंक नहीं बल्कि लिखने की आदत नही होना है। बहरहाल पिछले 20-एक दिन से गाँव में घर पर रह रहा हूँ छुट्टियों में, रोज़ दिन में चार-पांच बार कुछ न कुछ लिखने का ख़याल आता है लेकिन टाल जाता हूँ। आमतौर पर दिमाग में "अहा ! ग्राम्य जीवन" जैसी चीज़ें ही आ रही हैं जो कि साल भर दिल्ली में रहने के बाद काफी स्वाभाविक हो जाता है। लेकिन मैंने ठान लिया है कि अभी के लिए अहा ग्राम्य जीवन से हटकर कुछ कोशिश करूंगा। गर्मी के कारण घर से निकल भी नहीं रहा हूँ, इसलिए भी लिखना बंद है, अगर ज्यादा लोगों से बातचीत हो तो दिमाग में ज्यादा हलचल होती है। पहले कई बार नदी के या तालाब के किनारे बैठकर लिखने की कोशिश की, जब पुरी और मुंबई गया था तो वहाँ समुद्र के किनारे भी लिखने कि कोशिश की, लेकिन कलम ने चलने और शब्दों ने बहने से इनकार कर दिया। कई बार 4-5 लाइन लिख कर छोड़ दिया... बस बैठकर शून्य में ताकता रहा। वैसे सच कहूं तो समुद्र किनारे कुछ लिखने से कहीं ज्यादा सार्थकता लहरों में पैर भिगोने में है..
वैसे इन दिनों स्थानीय रेडियो स्टेशन अपने क्षेत्र के लोकगीत सुन कर बहुत मज़ा आ रहा है, और कुछ लोक-गायकों से मिलने की तमन्ना है, लेकिन अभी कोई प्लान नहीं बन पा रहा है।
पिछले दिनों डिकेंस की 'ग्रेट एक्सपेक्टेशन्स' पढी और खूब मजे से एक ही बैठक में पढ़ गया, अपने नायक 'पिप' की दुविधा के माध्यम से डिकेंस ने एक जबरदस्त रूपक गढ़ा है, जो 'सभ्य समाज' की जड़ों को दिखलाता है... एक साधारण लोहार परिवार में पला-बढ़ा पिप सभ्य, पढ़ा-लिखा और अमीर बनने के चक्कर में अपने सीधे -साधे परिजनों से नाता तोड़ लेता है, लेकिन जब उसे पता चलता है की उसकी अमीरी के पीछे एक सजायाफ्ता कैदी की गुमनाम मदद है, और साथ ही उसके सामने तथाकथित सभ्य लोगों की ज़िंदगी का लिजलिजा और टुच्चा यथार्थ आता है तो उसकी आँखें खुल जाती हैं, लेकिन तब तक वापसी के लिए बहुत देर हो चुकी होती है।
मुझे ऐसा समझ में आया कि ये उपन्यास प्रतीकात्मक ढंग से यह कहता है कि तथाकथित कुलीन वर्ग वास्तव में अपराध और अन्याय के पैसों पर खडा है, और उसके ढाचे को सरासर नाजायज़ ठहराता है..
उन्नीसवी सदी के ब्रिटेन में बसे पात्र मुझे आज भी बहुत ही सच्चे और जाने-पहचाने लगे, फिर चाहे वो झूठी गवाही दिलवाने वाला वकील हो, या अपने अभिजात्य वंश के गरूर में पगलाई माँ और नौकरों की दया पर पलते उसके बच्चे...
अब मन बनाया है कि डिकेंस की कुछ और रचनाएं पढूंगा। 'पिक्विक पेपर्स' पढना शुरू किया है।
वैसे छुट्टियों का "सदुपयोग" क्या होता है? अपन की छुट्टी तो किताब के पन्ने पलटते और घर के छोटेमोटे काम निपटाते हुए ही निपट जाती हैं, या फिर घूमते-फिरते।
एक नाटक करने का मन था लेकिन एक तो गर्मी जबरदस्त है और ऊपर से लोग शादियों में व्यस्त हैं, अपन भी थोड़े -बहुत व्यस्त हैं घर में कुछ निर्माण कार्य चल रहा है, वैसे उसका ज्यादा भार तो बाबा पर है।
न लिख पाने के कारण इतना सरपट लिख दिया, बेतरतीब सा। देखिये आगे कितना लिख पाता हूँ...

Sunday, 24 April 2011

मन-सुरंग

कभी कभार भीड़ भरी गलियों में एकांत कहीं ज्यादा जीवंत हो उठता है और कभी कभी एकांत में ख्यालों की भीड़ चैन नहीं लेने देती. ढर्रों पर टिकी ज़िंदगी के फर्श में दरारें ही दरारें हैं, जिनमे झांकते डर लगता है. सालों साल किसी अँधेरे, छुपे कोने से लोगों और चीज़ों को ताकते रहने का अनुभव अंतर्मन को पपड़ीदार बनाने के लिए काफी है.
गीत हैं, हर एकाकी क्षण के साथी. गुनगुनाना प्रार्थना नहीं है, न ही चुटकुला, वह तो बस एक और आदत है, अलबत्ता आदतों में इसकी जगह बहुत ऊपर है.
भटकना जगहों से जगहों तक, विषयों से विषयों तक, चेहरों से चेहरों तक और आवाज़ों से आवाज़ों तक, हर एक ठिठकन अगली भटकन की भूमिका भर है,
अरमान भी हैं, लेकिन वो बड़े पाजी गिरगिट हैं,
उम्मीद हर अगली परछाई में है, वह मरीचिकाओं में अठखेलियाँ करती है... वह रेगिस्तानों में इन्द्रधनुषों की तस्वीर है, वह किसी सरकारी स्कूल की बाउंड्री वाल पर उगता पीपल है. वह पतंग है...जो आसमानों में डूब उतरा रही है,
मैं ढील दिए जा रहा हूँ, मेरी गर्दन अकड़ गयी है, प्यास से गला भी सूख रहा है, आँखों में सूरज जल रहा है ...

Friday, 8 April 2011

मुझे असंभव, एकाकी सपनों में जीना है..

ज़िंदगी बहुत ठोस खुरदुरी और पथरीली
धरती गड़ती मेरे पांवों में,
यथार्थ घेर लेता मुझे अकेला पाकर
खड़ी कर देता दीवारें, पिंजरे
मन पंछी के लिए,
दिन-ब-दिन कितने दिन ले आते खींचकर
किस्से अनेक, अनेक अजनबी,
टटोलता खंगालता संभावनाओं को मैं,
सोचता बातें अनकही-अनबनी-अधबनी,
झल्लाता नाहक, अपनी सीमाओं के जाल
को झकझोरता,
पर अब ख़्वाब भी बोझिल-झिलमिल पलों
की कड़ी में पिरोना है,
किसी अकेली धुंधली भोर में, जब खटरागी
मेले- झमेले सो रहे हों,
कुछ सोचकर-बटोरकर,
फिर अव्यक्त आशा-उल्लास से भर जाना है,
मैं न भागूंगा समय और परिस्थितियों से,
लेकिन तुम यह जान लो, कि अब
चुपके-चुपके,
मुझे असंभव, एकाकी सपनों में जीना है

Sunday, 3 April 2011

हाफ पैंट में जादुई यथार्थवाद



अप्रैल का महीना है, गाँव शहरों, सुनसान गलियों और व्यस्त बाज़ारों में फिर धूल उड़ने लगी है। उपमहाद्वीप की चार महीने की अभूतपूर्व गर्मी जल्द ही अपनी पूरी प्रचंडता के साथ आ पहुंचेगी। कैम्पस में बोगनवेलिया के फूल छाए हुए हैं और पेड़ों से गिरे पत्ते मुंह और बालों से उलझते फिरते हैं.. दोपहर को अब वही चिरपरिचित सन्नाटा चुपचाप आकर घेर लेता है, जो बचपन से ही हर गर्मी दिलो-दिमाग पर घर कर लेता है।
मैं अगर अब किसी दोपहर आँख बंद कर लूं तो मैं उसी धूल भरे गाँव के किसी घर में चुपचाप अपने आप से कंचे खेलता पाया जाऊंगा, जहां अधिकाँश माँ-बाप सो रहे हैं, और कुछ किसी कोने में बैठ कर चुप-चाप कुछ गप-शप कर रहे हैं। लू के साथ धूल के बवंडर उठाते हैं जो मिट्टी की दीवारों और नन्हे दरवाजों को हराकर घरों के अन्दर तक घुस जाते हैं। माँ-बाप की बाहर न जाने की सख्त हिदायत को जीवन का एक अभिन्न निंदनीय अंग मानते हुए चांडाल-चौकड़ी चुप-चाप बेआवाज़ घरों से बाहर निकल आती है, और फिर या तो पेड़ों से कैरी तोडना या फिर कंचे, पत्ते, छुपन-छुपाई, पिट्टू (सितौलिया) या कोई और खेल खेलना, यही परम धर्म है। और जब भोंपू की आवाज़ कानों तक पहुँचती तो फिर एक रुपये वाली पनीली तथाकथित 'कुल्फी' का अविराम सेवन करना, जिससे पीलिया और हैजा होने की अपार संभावनाएं जताई जाती हैं।
तब ये नहीं पता था कि इंसानी ज़िंदगी में इतने दांव-पेंच होते हैं। तब किसी शाम को यह संभावना नहीं होती थी कि आप इस पर विचार करें कि बोर्खेस में जादुई यथार्थवाद किस तरह परिलक्षित होता है। तब जादुई यथार्थवाद किताबों में खोजना नहीं पड़ता था, वह तो दैन्दिनी ज़िंदगी का हिस्सा था... जब गाँव से स्कूल की और चलते थे तो मुझे याद पड़ता है कि हम सभी जादुई यथार्थवाद के बहुत बड़े समर्थक और प्रचारक हुआ करते थे। (हालाँकि नोबेल कमेटी को हमारी प्रतिभा जानने में अभी वक़्त लगेगा) मुझे याद पड़ता है कि मैंने घर से स्कूल की ओर चलते हुए जादुई यथार्थवादी एक कहानी बनाई थी, जिसमें हमारे ही गाँव के एक लड़के को आंधी उड़ाकर एक किलोमीटर दूर ले गयी थी, और चूंकि उस प्रकार के बवंडर (भंगुरिया) का केंद्र एक भूत माना जाता था, अतः उसके बाद भूत और लड़के की बातों का विषद चित्रण और तत्पश्चात उस लड़के के छूटने का प्रसंग बताया गया था, और चूंकि कथा नायक एक जीता जागता लड़का था. (जो सौभाग्य से उस वक़्त गवाही देने के लिए उपलब्ध नहीं था) अतः हमारे साथी आलोचकों ने न केवल इस कथा पर पूरा विश्वास किया बल्कि उसे हाथों-हाथ लिया।
किस्से-कहानी इतने थे कि ख़त्म होने का नाम नहीं लेते थे और आज अगर याद करने बैठूं तो उन कहानियों की बहुत धुंधली सी ही याद है, विजयदान देथा जी की लोक-कथाओं से कुछ मिलती जुलती होती थीं वो। शायद अब भी जाकर गाँव में किसी अलाव के पास ठण्ड में बैठूं या गर्मी में किसी आम के पेड़ के नीचे, तो फिर उन्हें जी सकूंगा, लेकिन अब मेरा सिनिकल दिमाग शायद उन्हें एक वयस्क पढ़ी-लिखी नज़र से देखेगा। उनका साहित्यिक मूल्यांकन और तारीफ तो अब मैं कर सकता हूँ, लेकिन अब मैं विश्वास कैसे करूंगा कि धूप में बारिश होने पर लड़ैया(सियार) की शादी होती है...
अब जब कभी तालाब के किनारे बैठे हों और पुराने यार-दोस्त मिलते हैं तो यही बातें होती हैं रोजी-रोटी हालचाल की, उनमे से ज्यादातर अब मेहनत-काम धंधे से लग गए हैं, और अपन यूनिवर्सिटी में बैठकर किताबें चाट रहे हैं।
सोचता हूँ इस बार जब गर्मी में घर जाऊंगा तो जाकर जुगन दादा की डैम के पास वाली टपरिया में बैठकर जादुई यथार्थवाद पर विचार करूंगा, देखते हैं बोर्खेस और पप्पू भैया में से किसका पलड़ा भारी बैठता है....

Saturday, 19 March 2011

होली पर ऐंवें ही....



बने कविता नहीं अगर तो

लिखो ऊट-पटाँग

जो ज्ञान की बातें फांके

खींचो उसकी टांग

पढ़ा ज्ञान सब धरा रह गया

नहीं लगा कुछ हाथ

अब तू बैठा रह गया

झुका शर्म से माथ

रोना रोते रोते जब

भर जाये तालाब

तालाब में मच्छी पकड़ो

ऊँचे देखो ख्वाब

फूले सेमल टेसू फूले,

फूले अपनी तोंद,

झूले भंवरे फूलों ऊपर

भौंक सिपहिया भौंक

मुंह तो काला हो ही जाये

असमानी हों बाल

नाम ख़ाक रोशन करेंगे

अपने जैसे लाल

रंग गुलाल अबीर उड़े और

रहे नहीं कुछ होश,

अबकी होली ऐसे खेलो

हिरन और खरगोश...

सबको होली मुबारक !


चश्मे वाली फोटो अपनी है और दूसरी दोस्त की...

...

Friday, 25 February 2011

एक्झोटिक होने का सुख...


एक शब्दकोष से exotic का मतलब: : strikingly, excitingly, or mysteriously different or unusual
जब से महानगरीय जिन्दगी की छाया पड़ी है, जीवन कुछ ज्यादा ही फिल्मी लगने लगा है। क्लास जाते हुए लगता है मानों शहसवार मैदाने-जंग की ओर भारी कदमों से बढ़ रहा है, उसके मन में डर भी है लेकिन गर्व से सीना ताना हुआ है, आज कितने भी पिरोफेसर आ जायें, कित्ता भी मध्ययुगीन साहित्य सर पर लाद दिया जाए मैं कर्तव्यपालन से पीछे नहीं हटूंगा। कैम्पस में बेमतलब भटकते हुए लगता है कि सारे कवि-साहित्यकारों का जीवन आप खुद जी रहे हैं, और इसी बेमतलब रगड़ने से आदमी की दार्शनिकता का जन्म होता है, सार यह कि बोरियत दार्शनिकता की जननी है।
जिस दिन खाने में कढ़ी हो उस दिन शहीदाना अंदाज़ में ढाबों के आस-पास भटकते हुए लगता है कि जीवन कोई हंसी खेल नहीं..
परीक्षा के दिनों में तो सूरत वास्तव में योद्धाओं जैसी होती है, कोई जान पहचान वाला कुछ पूछे उससे पहले ही तड़ाक से कह दिया जाता है, कि भाई साहब परीक्छा चल रई हे अब बताओ का करें,कल जा बिसय को पेपर है, परसों बा बिसय को... ओर बा फलानी मेडम ने तो दिमागई खराब कर डारो... जित्ता पढाबे हे बासे डेढ़ गुना पूछेगी....
लेकिन सबसे ज्यादा जो असर या कहें कि विकृति आयी है वह है एक्झोटिक दृष्टि... एक्झोटिक दृष्टि से यह होता है कि आप अपनी आस-पास के नकली वातावरण को असलियत समझते हैं और ज़मीनी हकीकत को एक्झोटिक।
नतीजा ये कि बन्दा गाँव जाता है, तो सबसे पहले तो उसे पेड़ एक्झोटिक लगते हैं, फिर जानवर। खुदा ना खास्ता किसी गाय को दुहे जाते हुए देख लिया तो लोग कैमरा निकाल कर फोटो खींचने लगते हैं, अगर ठण्ड में अलाव दिख गया तो मध्यमवर्गीय मन खुशी से उछल उछल जाता है..और हालाँकि अपने महंगे कपड़ों की चिंता करते हुए उन्हें राख और चिंगारियों से बचाते हुए पसर तो नहीं पाता, लेकिन उकडूं बैठे बैठे ही किसी तरह हाथ सेंक कर वह अतीत में गोते लगाने लगता है... अगर गर्मी की रात हो और साफ़ आसमान, तो अचानक एक्झोटिक तारे नज़र आने लगते हैं, और 'हाउ क्यूट' कहते हुए लोग गालों पे हाथ रख लेते हैं...
ये तो हुई चीज़ों की बात, सबसे महान एक्झोटिक अनुभव लोगों को लोगों से बात करते हुए होता है। अगर खड़ी बोली के अलावा कोई बोली बोलने वाला कोई खालिस देहाती मिल गया तब तो हमारे नायक का दिल बल्लियों उछलने लगता है वह तोड़-मरोड़ कर उसी बोली में बे-सिरपैर के प्रश्न पूछने लगता है और मन में सोचता है कि वह एक महान युगपरिवर्तनकारी मानवशास्त्रीय-समाजशास्त्रीय (anthropoligical -sociological) प्रयोग का हिस्सा बन रहा है। लोगों को नदी में नहाना महान क्रांतिकारी काम लगता है, हालांकि दिशा-मैदान अगर जंगल में जाना पड़े तो प्रयोगधर्मिता की इतिश्री हो जाती है।
लेकिन कभी कभार मक्का की रोटी तोड़ते हुए अचानक तड़ित प्रहार की तरह नायक को समझ आता है, कि ये सब एक्झोटिक नहीं, मैं एक्झोटिक हूँ, मैं असामान्य हूँ, क्योंकि मैं जो अपनी सुरक्षित-सुविधासंपन्न आधुनिक ज़िंदगी जी रहा हूँ, ये खोखली है.... इसमें कोई महक नहीं है, कोई किस्से कहानी नहीं हैं, उल्लास नहीं है, यहाँ तक कि ज़िंदा होने का मतलब भी नहीं है, सब एक महान प्रपंच का हिस्सा है जो हम तथाकथित 'समझदारों' ने अपने मन-बहलाव के लिए गढ़ रखा है। प्रकृति 'एक्झोटिक' नहीं है, वह स्वाभाविक है, हम लोगों ने अपनी ज़िंदगी से प्रकृति और स्वाभाविकता को दोनों को गायब कर रखा है, इसलिए हमें exotic destinations की जरूरत पड़ती है। अगर हम अपने आप को प्रकृति और समाज से जोड़ कर देखेंगे तो सारी एक्झोटिकता पल में गायब हो जायेगी और अकल ठिकाने आ जायेगी..
(मैंने कहा था , बोरियत दार्शनिकता की जननी है, इस दार्शनिक पोस्ट से यह सिद्ध हो गया !)
आदतन फोटो गूगल इमेज से चुराया हुआ है..