Tuesday, 24 April 2012

अकेलेपन के मायने

अकेलेपन के मायने  

अकेलेपन के मायने कई होते हैं.. 
कुछ परिचित गानों का बार बार गुनगुनाना 
कुछ राह चलते खुद से बतियाना 
कुछ ताकना जाने अनजाने चेहरों को गौर से 
कुछ नजरें चुराना कईयों से 
कुछ भीड़ में भी गुम रहना 

कुछ डूबा रहना किताबों में, किस्सों में 
खयालों में, खयाली पुलावों में
रह रह कर उमडना-घुमडना,
बरसने का इंतज़ार करना,
बेमतलब मुस्कुराना सोच सोच
अपने ही चुटकुले,

अपनी आदतों में घुसते जाना-
जैसे कछुआ ढोता है
अपने ही पलायन की गुफा
अपनी पीठ पर,

झल्लाना-झुंझलाना आईने पर,

मुद्दई और गवाह खुद होना,
खुद ही जज बन अपने मुकद्दमों
को तारीख न देना हफ्ते दर हफ्ते,
तकरीरों औ मशवरों का कूड़ेदान होना,
महफ़िलों औ मेलों का सुनसान कोना,

कान उगाना,
मुंह सिलना,

अपने अकेलेपन से कहना
कि तू अकेला ही अकेला नहीं है,
कि अकेले अकेले ही
अकल आ जाती है,
कि आजादी अकेलापन है,

खैर,
अकेलेपन के मायने भी
अकेले बैठे ही समझ आते हैं..

Wednesday, 11 April 2012

कहने दो उन्हें जो यह कहते हैं...



आजकल बाज़ार में टूथपेस्ट के नए विज्ञापनों का चलन है.. जो दावा करते हैं कि वे आपके दांतों की 'सेंसेटीवीटी'
याने संवेदना खत्म कर देंगे.. याने ठंडा-गरम खाने-पीने से होने वाली तकलीफ/अहसास खत्म हो जाएँगे. जैसा कि चलन है, एक के बाद और कंपनियों ने भी यह फार्मूला अपना लिया, जैसा कि पुरुषों के गोरेपन की क्रीम से लेकर अभी तक चला आ रहा है. एक कंपनी अपनी तथाकथित मार्केट रिसर्च के बाद जो शिगूफा छोडती है, वो आग की तरह सारे दिमागों तक पहुंचाया जाने लगता है. यह नहीं कि आप ठंडा-गरम कम खाएं और दांतों का ख़याल रखें. उनकी संवेदना ही कुंद कर दी जाएगी..

लेकिन मैं रिमूव सेंसेटीवीटी.. की 'कैचलाइन' सुनकर सोच में पड़ गया. मुझे समझ में आने लगा कि यह सिर्फ दांतों का मामला नहीं है, दरअसल हर किस्म की संवेदनशीलता को खत्म करने का अभियान जारी है.

भावों, खासकर सहानुभूति, पीड़ा, ग्लानि -जैसे तथाकथित 'नकारात्मक' भावों को दबाने के लिए जनाब श्री श्री से लेकर तमाम बाबाओं की दुकानें चलती हैं. कोई माने या न माने.. लेकिन यह इंसान का एक मूल स्वभाव है, कि वो औरों के दुःख से दुखी, द्रवित होता है, साथ ही यह सोचने पर भी मजबूर होता है, कि आखिर क्या कारण है कि इतने लोग इतने बुरे हालत में जी-मर रहे हैं.

लेकिन यह ज़माना देखकर भी न देखने का ज़माना है, इसीलिए सालों से शहर के बीच में रह रहे मजदूरों-कारीगरों की झुग्गियों को अस्सी के दशक से ही उठाकर शहर से बाहर फेंका जाने लगा, ये कालोनियां 'अवैध', 'गंदी', अपराधियों का अड्डा या फिर विकास का अवरोध आदि कई कई नामों से हटाई गयी.. वहीं बिल्डरों के अवैध निर्माण चुपचाप वैध हो गए.. रेसिडेंट वेलफेयर असोसिएशन वगैरह की त्रासदी को मीडिया में भी जगह मिली, पर पिछले दिनों से देखता हूँ कि झुग्गियां तभी सुर्ख़ियों में आती हैं जब वहाँ आग लगती है, जहरीली शराब पीकर लोग मरते हैं या फिर लाठी चार्ज/पथराव होता है.

सौन्दर्यीकरण या शंघाईकरण का मतलब बस यही है कि कांक्रीट के जंगलों में गिने चुने इंसान बचें जो काले शीशों में बंद ठंडी हवा खाते रहें, और उनके गुलाम हमेशा परदे के पीछे रहें.. अदृश्य, मानो किसी आधुनिक मशीन के पुर्जे.. जो बोनट में बंद हैं..

दिल्ली में अस्सी के एशियाड में बड़े पैमाने पर बस्तियों को उजाडा गया.. फ्लाईओवर बने जो जल्द ही बढती कारों के बोझ तले कम पड़ गए.. मजदूर सुबह शाम खचाखच भरी बसों में लथपथ दो तीन घंटे सफर कर काम करने जाते और लौटकर अपने दस बाय बारह के दडबे में सो जाते, जहां पानी,शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी चीज़ों के भी सपने ही पाए जाते. इस तरह शहर का वो थोड़ा बहुत आम चेहरा टूटा जो पुरानेपन की पहचान था, जब गरीब भी अमीर के मोहल्ले में दुआ-सलाम कर रहा करता था, ये आधुनिक अपार्थाइड था.. अब शहर खास थे.. शहर के कुछ हिस्से खास थे. जहां कृष्णों को सुदामा पर मेहरबानी करने की भी जहमत नहीं उठानी पड़ती थी. सुदामा को अपहरण कर गायब कर दिया गया ताकि कृष्ण की मौज में खलल नहीं पड़े..

अभी कामनवेल्थ खेलों में तो सरकार ने झुग्गियों के सामने बड़े बड़े परदे-होर्डिंग लगवा दिए, ताकि हमारे नफीस मेहमानों को हमारे जाहिल देशवासी दिखाई न पड़ें, ताकि महाशक्ति बनाने के ख्वाब पर फटे तलवों, पसीने और निराश निगाहों के दाग न लगें, ताकि दक्षिण दिल्ली की चिकनी सड़कों पर दौडती लक्झरी कारों और पंचसितारा होटलों में मयनोशी करते अमीरजादों में ही हिन्दुस्तान की परछाई नुमाया हो. यह बात अलग है कि इन खेलों को देखने कोई आया ही नहीं और इस बहाने बहुत से होटल वालों को सस्ती ज़मीन मिल गयी.

तो यह तय है कि हमारे समय में संवेदना की जरूरत और अस्तित्व को खत्म करने की पुरजोर कोशिश जारी है, डाक्टर और बाबा सलाह देते हैं कि हमेशा खुश रहो, पाजीटिव सोचो, बल्कि सोचो ही मत तो सबसे अच्छा.. अपने घर-दफ्तर और बाजार में बस अगले प्रमोशन, अगली छुट्टी, अगले मोबाइल, अगली फिल्म, अगले चुटकुले का इंतज़ार करो. अगर सड़क पर, गली में, फुटपाथ पर या बस की खिड़की से कुछ ऐसे लोग दिखाई पड़ जाएँ जो कुछ अजनबी से हों, जिन्होंने ब्रांड के कपडे नहीं पहने हों, या जो खिली खिली क्रीम छाप त्वचा के मालिक नहीं हों, जिनकी आँखों में अभी भी कमरे के किराए और माँ की बीमारी और गाँव की फसल की चिंता हो, तो समझ लो कि वह सीनरी का हिस्सा है, बल्कि वह तुम्हारे मनोरंजन-विविधता के लिये ही वहाँ खडा किया गया है. कि वो जहां हैं वहीं खुश है, कि वे उसी लायक है, कि उनकी किस्मत में वही लिखा है, कि वो इसीलिए नहीं मुस्कुराते क्योंकि वे कोलगेट नहीं कोयले से दांत मांजते हैं. कि वे इंसान नहीं खच्चर हैं..

जी हाँ यह संवेदनाओं का कब्रिस्तान है मेरा देश, यह समय छोटी याददाश्त और टुच्चे सपनों का समय है. जब कानों में हेडफोन लगे हैं और चीख-पुकार सुनाई नहीं देती, न ही खौफनाक मंज़र दिखाई पड़ते हैं फैशनेबुल धुप के चश्मों में. पांच हज़ार लोग भूख हड़ताल पर बैठते हैं, जो देशद्रोही हैं, जो विकास विरोधी हैं, जो 'एंटीला' जैसे बंगलों को बिजली देने के लिए अपने भविष्य की कुर्बानी देने को तैयार नहीं हैं..

नोंनाडांगा में माँ माटी और मानुष वाली नेत्री.. उक्त तीनों पर हमला करती है, दो सौ बेघर परिवार, जो अपनी तारपलीन की झुग्गियों में तूफ़ान से उजड जाने के बाद रह रहे थे.. उजाड दिए जाते हैं, यकायक, उनके पास कागजात नहीं है, लेकिन उससे भी बड़ी बात यह कि वो अमीर-जात नहीं हैं.. वो रिक्शा खींचने, बर्तन मांजने, ईंट धोने वाले हाथ हैं, वो 'हीरा है सदा के लिए ', पहनने वाले और वैक्सिंग करवाने वाले हाथ नहीं हैं. कुछ हाथ और भी उठे इनका साथ देने को.. लेकिन हथकडियां अब तैयार बैठी हैं, क़ानून बन चुके हैं.. जो हाथों को उठने से रोकते और सलाम करने पर मजबूर करते हैं.

मुझे ठंडा-गर्म महसूस होता है अब भी, मेरी रगें सनसना उठती हैं.. मैं हर एक को झकझोर कर कहना चाहता हूँ, ऐसा टूथपेस्ट-क्रीम मत लगाना कि, किसी उजड़ते हुए परिवार को देखकर रोना न आये, कि किसी पिटते हुए मजदूर को देखकर गुस्सा न आये, कि किसी लड़ते हुए किसान को देखकर प्रेरणा न मिले .. ऐसे मत बन जाना कि हमारे सामने ये देश, समाज, लोग खत्म किये जाते रहें.. कि न्याय, समता, इंसानियत सब विज्ञापन बन कर रह जाएँ जो चमकती दीवारों पर सजे हों, जिनके नीचे लाशों पर बाजार के फूल खिलें हो, और हम खड़े शून्य में ताकते रहें या मौज मनाते रहें. अभी भी समय बाकी है, अभी भी लड़ाई जारी है..
मुक्तिबोध के शब्दों में -
इतना गूढ़, इतना गाढ़, सुंदर-जाल –
केवल एक जलता सत्य देने टाल।
छोड़ो हाय, केवल घृणा औ' दुर्गंध
तेरी रेशमी वह शब्द-संस्कृति अंध
देती क्रोध मुझको, खूब जलता क्रोध...

फोटो नोनाडांगा के विस्थापितों की एक तस्वीर है जो 'डाउन टू अर्थ' पत्रिका से ली गयी है,

Thursday, 5 April 2012

गाँवों-कस्बों के लोग

गाँवों-कस्बों के लोग

इंग्लिश सुन सुन कुछ घबराते
गाँवों-कस्बों के लोग
तेल चुपड़कर बाल बनाते
गाँवों कस्बों के लोग,
हरदम गर्दन खूब घुमाते
गाँवों-कस्बों के लोग.
इधर घूरते उधर ताड़ते
सब कुछ नया नवेला पाते.
खुद को निपट अकेला पाते
दौलत पर पलकें झपकाते
गाँवों कस्बों के लोग.
दृश्य नया संसार नया है,
ये शहरी दरबार नया है,
निर्मम कारोबार नया है
इज्जत का आधार नया है,
देश नया ये भेष नया है
काले गोरे बन बैठे हैं
गोरे मन-दर-मन बैठे हैं
मॉल में जा और कॉफी पी
ढाबा है नाकाफी, पी !
हाथ हिला हिला कर बोल
यू आर वेरी गोल मटोल,
बातें हो सिंगापुर की
यूएस की शंघाई की
देश की हों भी अगर
मानो हो अजायबघर,
सुन सुनकर बहुत चकराते
गाँवों कस्बों के लोग.
बातचीत में बोलचाल में
रंग-ढंग में देखभाल में
अपना -सा कुछ न मिलने पर
अपनी हालत पर झुंझलाते
गाँवों कस्बों के लोग,
शायद यही तो नियति है
जो थोथा है -वो प्रगति है
बिक न सके जो, माल बुरा है
हम जैसों का हाल बुरा है,
अक्षम चिंताओं को ढोते
गाँवों-कस्बों के लोग,
वे जो मदमस्त हो लोटें
'मैं' की धुन में अमृत घोंटें
जिनका जीवन स्वर्णजडित है
फिर भी जो सौंदर्य रहित है
धीरे धीरे खुद को खोते
'उनके' जैसा होते होते
इक दिन खुद को कहीं न पाते
गाँवों कस्बों के लोग.

Sunday, 19 February 2012

जनरल नालिज

जनरल नालिज

वह रट रहा है,
वह रट रहा है बासी कानूनों के पास होने की तारीखें,
गुमनाम देशों की राजधानियां,
कोरे सिद्धांत,
थोथे दृष्टान्त.
अनगिनत आंकड़े जकड़े हुए,
वह भूल रहा है
लोग,यादें,शक्लें,
बातें, मुद्दे, बहसें,
गीत,कविता,किस्से,
आँखें, हाथ, मस्से..
वह रट रहा है,
अखबारी तकरीरें,
सरकारी तदबीरें,
जंग खाई जंजीरें,
वही भाषा,
वही आशा,
इम्तेहान दर इम्तेहान,
वह गर्दन झुकाए रट रहा है,
किसी उपनगरीय दड़बे में
मैगी और खिचड़ी
या ढाबे के पराठों को निगल-निगल दोहराता है
तथ्य तथ्य और तथ्य.
जी के,
जनरल नालिज,
'सामान्य' ज्ञान !
हम असामान्य हैं,
हम दुखी हैं,
हम बेरोजगार हैं,
हम रटते नहीं हैं,
सरकार से पटते नहीं हैं,
बाबूजी दुखी हैं,
लोग ताना देते हैं,
बस !
अब ...
हम सवाल नहीं करेंगे,
हम अंड-बंड नहीं पढेंगे,
बस योजना, क्रानिकल,
दर्पण, और कुछ अखबारों में
हम अंगरेजी के कठिन शब्दों को अंडरलाइन करेंगे,
हां, हम भूल जायेंगे,,
अपनी भाषा,
अपने लोग
अपनी समस्या,
अपनी पहचान,
वह सब कुछ जो कोर्स मटेरिअल
में नहीं आता है,
जी. के. में वही आता है
जो दिल में नहीं आता.
तेरी-मेरी, चार लोगों की बातें,
मोहल्लों के इतिहास,
गाँवों के मसले,
बस्तियों की बतकही
खेतों की फसलें
पानी और बिजली
बुखार और खुजली
अपनी इबारतें
सपनों की इमारतें....
इन सब पर एक अदद नौकरी भारी है.
इसलिए अब 'सामान्य ज्ञान'
के फावड़े से
अपनी जड़ खोद कर वहाँ
चार विकल्प दे देंगे
ए. अफसर.
बी, बाबू
सी. क्लर्क
डी. रोबोट !

,

Sunday, 5 February 2012

एक खोजी अभियान की भूमिका


बातें जो कही नहीं गयी..
वादे जो निभाए नहीं गए,
सपने जो देखे नहीं गए..
लोग जो ढूंढें नहीं गए.
कहानियाँ जो सुनायी नहीं गयीं.
और कविताएँ जो गले में आकर अटकी,
फिर किसी अकेले पेड़ के नीचे बैठी रह गयीं.
और कहा जा रहा है, मैं 'नेगेटिव' सोचता हूँ.
सच तो ये है कि मैं नेगेटिव नहीं सोचता,
नेगेटिव मुझे सोच रहा है.
एक दिन मैं परछाइयों से गुजर रहा था,
वहीं नेगेटिव ने मुझे पकड़ लिया
और तब से वह मेरे कानों में फुसफुसाए जा रहा है,
हर एक मुनादी के बाद
वह आवाज़ तेज हो जाती है..
अब मैं और नेगेटिव, नेगेटिव और मैं
हम भेष बदलते रहते हैं,
अब मैं उजालों से दूर झुरमुटों में चलता हूँ,
अब मैं समय की पगडंडी की धूल छानता हूँ
शायद कोई सुराग मिल जाये
कहाँ गए वो लोग, वादे, सपने, कहानियां, कविताएँ,
नेगेटिव ने मुझसे कहा है,
कि इन गुमनामों में ही मेरी पहचान की चाबी छुपी है..
तुम्हे पता लगे तो बताना,
आखिर सवाल मेरा नहीं
अंधेरों का है,
सन्नाटे का,चुप्पी का है,
डर का है,
गुस्से का है
और कहीं ज्यादा
सवाल सच का है
जो खुद बहुरूपिया बने
किसी पीछे छूट गए हरकारे की राह तक रहा है,
सहमा सा .

Monday, 4 July 2011

पप्पू की आँखें लाईट ब्लू ...

जब जब ये गाना सुनते हैं नाचीज़ से रहा नहीं जाता, बरबस ही निकल पड़ता हूँ इस पप्पू की तलाश में..मध्य-भारत के किसी भी धूल-धूसरित कसबे में रहते हज़ारों लाखों पप्पुओं में नज़र घूम-घूम कर थक जाती है, लेकिन एक अदद अंग्रेज पप्पू अभी तक मिला नहीं, ब्रेडो की घड़ी पहने कुड़ियों में क्रेज़ बना वह पप्पू न जाने किस गली में मिलेगा... हमारा पप्पू तो रोज सुबह साढ़े आठ बजे सिर में खोपरे का तेल लगा कर चपेट कर बाल काढ़ता है, फिर चटख रंग की बुश्शर्ट और टाईट पैंट 'पाटीदार टेलर्स फैंसी मेंस सूटिंग एंड शर्टिंग' से सिलाई हुई पहन कर घर से निकलता है। जाते जाते मम्मी घर से आवाज़ देती हैं बेटा पप्पू ज़रा चायपत्ती लेते आना, तो भुनभुनाते हुए मम्मी से कुछ पैसे ज्यादा लेकर निकल पड़ता है। तंग गलियों में लड़-झगड़कर पानी भरती आंटियों और दफ्तर या दुकान जाते अंकलों से दुआ सलाम करते हुए पप्पू को वही पुराने यार दोस्त दिखलाई पड़ते हैं चाय की दुकान, पान की गुमटियों और मोबाईल की दुकानों पर रुकते ठहरते पप्पू अपने गंतव्य तक पहुँच जाता है। पप्पू का धंधा उसकी हैसियत के मुताबिक़ कुछ भी हो सकता है, मोटर-मैकेनिक, दुकान में हेल्पर, दफ्तर में क्लर्क-चपरासी, बीमा एजेंट, इलेक्ट्रिशियन, या फिर हम्माल, चपरासी या चाय की दुकान का मजदूर।
इस पप्पू को उस पप्पू को टीवी पर देखने का समय कम ही मिलता है, लेकिन कभी कभार देख कर जेब से कंघी निकाल कर टेढ़ी मांग निकाल लेता है और एक बार आईना देख कर फिर काम पर लग जाता है।
मुझे उस दिन का इंतज़ार है जब हमारे पप्पू पर भी गाने बनेंगे और उस विदेशी पप्पू को खोज कर इस पप्पू के सामने खडा किया जाएगा, देखते हैं दिन भर दुकान पे उस्ताद की गालियाँ खाने के बाद कौन बेहतर डांस करता है, अपने पप्पू ने भी कई बरातों में माहौल जमा दिया था कसम से...

Tuesday, 14 June 2011

कबिरा खडा बाजार में..

मेरे गाँव में हर रविवार हाट लगता है... या स्थानीय भाषा में 'बजार' भराता है। आस-पास के १०-१५ गाँव के लोग अपनी साप्ताहिक खरीददारी करने के लिए आते हैं, वैसे पूरे जिले में ही हफ्ते के अलग-अलग दिन अलग अलग गाँव के बजार के लिए तय हैं। मेरे गाँव केसला के आस-पास सुखतवा का बजार गुरूवार, साध्पुरा का सोमवार, भौंरा का शुक्रवार को पड़ता है।
जो इन बाजारों से परिचित न हो उसके लिए इनके रंग और गांववालों के लिए इनका मतलब समझना थोड़ा कठिन है। बहुत पुराने समय से ही बजार हमारे आदिवासी बहुल-क्षेत्र में सिर्फ खरीदने-बेचने से कुछ बढ़कर है... यह एक दिन है जब हमारे बाशिंदे अपनी रोज़ की मेहनत-मजूरी से हटकर अपनी ज़िंदगी में कुछ रंगों की तलाश में पैदल या साइकिल से बजार पहुँचते हैं... होशंगाबाद और बैतूल जिले की आदिवासी पट्टी के किसी भी बजार में आप जाएं तो नजारा एक सा होता है। रंग-बिरंगी पारंपरिक सोलह गज की साड़ियों में आदिवासी महिलाएं थैला लिए कुछ खरीदती, कुछ देखती हुई दिखाई दे जाएंगी, अधिकतर घर के सामान की खरीद महिलाएं ही करती हैं। (इस मामले में आदिवासी समाज अन्यों से अलग हैं जहां 'बाहर' का काम पुरूषों के हवाले और 'अन्दर' का महिलाओं के जिम्मे होता है) पुरुष भी, जिनमे आमतौर पर युवा लड़के ज्यादा होते हैं, अपने दोस्तों के कन्धों पर हाथ रखे चहलकदमी करते हैं।
जितनी दुकानें सब्जियों और अनाज की होती हैं, लगभग उतनी ही कपड़ों, और आईना, बिंदी, चूड़ी, रुमाल, कंघी,पिन, तेल, चप्पल, आदि की होती हैं... ये सभी दुकानदार एक बजार से दूसरे बजार घूम घूमकर अपना धंधा करते हैं।इनके आगे लटके रंग-बिरंगे रुमाल सहज ही ध्यान खींचते हैं(बुंदेलखंड-महाकौशल में लगभग हर मर्द के गले में एक गमछा-रुमाल जरूर होता है, जो तौलिये, चादर, पोटली, रस्सी, और सिर ढंकना आदि के बहुउपयोगी अवतार में इस्तेमाल होता है)
बजार के लिए लोग सज-सवंर कर तैयार होते, यह एक ख़ास मौक़ा होता है गाँव के जीवन में. मुझे आज भी याद है कि रविवार दोपहर हम सब नहा-धोकर सिर में खूब सारा खोपरे का तेल चुपड़ कर साबुत कपडे पहन कर बजार जाने के लिए तैयार हुआ करते थे, (हम में से ज्यादातर के पास केवल एक जोड़ी साबुत-फिट बैठने वाले कपडे थे-स्कूल की यूनिफार्म, आज भी स्थिति कुछ ज्यादा बदली नहीं है) खाकी पैंट और सफ़ेद शर्ट से सुसज्जित चार पांच नन्हे हीरो अकड़ कर निकलते थे, अपने उन छोटे भाई बहनों की तरफ गर्व से देखते, जो अभी बजार जाने की उम्र के नहीं थे। बजार में अलग-अलग चीज़ों की दुकानों को जी भर के देखने के बाद हम पैसे मिलाते और ४-५ रुपये का नमकीन खरीद कर खाते। उसके बाद धुंधलके में धीरे-धीरे गाँव की ओर चल पड़ते, रस्ते में गाँव के लोग मिलते, कुछ हंसी मजाक होता (आजकर ज्यादा हंसी मजाक मेरे विशाल डील-डौल पर होता है) और दिन ढलते सब घर पहुँचते, जहाँ बच्चे सबसे पहले झोलों पर झपटते, जहां नमकीन, जलेबी या कोई और चीज़ उनके लिए रखी होती। मजदूरी के पैसे भी बजार के ही दिन मिलते हैं। गाँव के लोग अपनी वनोपज वगैरह बेचने के लिए लाते हैं और बदले में अपनी जरूरत का सामान ले जाते हैं।
बजार में आस-पड़ोस के गाँव के लोग मिलते हैं, महिलाएं एक तरफ खड़े होकर घर-परिवार की, गाँव की बातें करती हैं, दुःख और सुख साझा किये जाते हैं। इनमे से ज्यादातर गाँवों में किराने की दुकानें नहीं होती थी, इसलिए बजार एक तरह से "बाजार" की उनके जीवन पर एकमात्र दस्तक थी जिनकी ज्यादातर जरूरतें खेत और जंगल पूरा किया करते थे। लालमिर्च, मसाले, कनकी(चावल की चूरी) और कुछ सब्जियां लोगों के झोलों में झाँकने पर दिख जाएंगे। बजार में ही आदिवासी युवक-युवतियों के माँ-बाप उन्हें एक-दूसरे से मिलाने के लिए लाते हैं, सम्भावित रिश्ता पक्का होने से पहले। चूंकि आदिवासी समाज में प्रेम-विवाह भी प्रतिबंधित नहीं है हालांकि उन्हें प्रोत्साहित नहीं किया जाता, इसलिए अनेक प्रेम-कथाओं का जन्म भी बाजारों में हुआ है॥
अपनने बहुत पहले से घर की सब्जी लाने का जिम्मा उठा लिया था, इसलिए आज भी छुट्टियों के दौरान बजार जरूर जाते हैं, और आते-जाते चेहरों में कोई परिचित चेहरा ढूंढते रहते हैं। सब्जियों के बढ़ते दामों को कोसते-कोसते अक्सर ही कोई छठी-सातवीं का सहपाठी मिल जाता है, जिसके चेहरे को ध्यान से देखने पर नाम याद आ जाता है। हाल-चाल पूछने के बाद थोड़ी देर उन दिनों को याद करते हैं जब दोनों निक्कर पहने दुनिया भर की हांका करते थे और यह महसूस कर अजीब लगता है कि अब जब दुनिया देखने के दिन आये हैं तो हांकने के लिए कुछ मिल नहीं रहा है।
पिछले बजार किरार सर मिल गए थे, जो हमारे मिडिल स्कूल में अपने सवा पाव के हाथ के जोर पर गधों को घोड़ों में बदलने की घुडसाल आज भी चलाया करते हैं, सर ने ये उम्मीद जाहिर की कि अपन उनका नाम रोशन करेंगे, (अपन को स्वयं प्रकाश की एक कहानी याद आ गयी, जिसमे एक बच्चा सोचता है कि वो अपने बाप के नाम का बोर्ड लगवा कर उस पर रंग-बिरंगे बल्ब लगवा देगा) अपन ने एक विनम्र मुस्कान से काम चलाया।
बजार भी बदल रहे हैं, दुनिया भी बदल रही है, उम्मीदें लम्बी चौड़ी हो रही हैं और अपन १० रुपये के सवा किलो टमाटर खरीदकर खुल्ले पैसों के लिए बहस कर रहे हैं...