Wednesday, 24 December 2014

कुछ वक़्त और


कुछ वक़्त और

वक़्त ढहता गया
ताश के पत्तों का एक महल
जिस पर मैं खड़ा था
जिस पर मैनें खींच कर
तुमको ला खड़ा किया था
जिस पर सवार हम चले थे
अविश्वास, धोखे, अनिश्चितताओं
के पार
तुम आयी थी अपनी पक्की ज़मीन
छोड़ कर, ये लीप ऑफ़ फेथ था
कि हम उड़ते चले जायेंगे
कि हम बह चलेंगे आगे
और पीछे रह जायंगे दुनियावी मसले
समझौते, दिमागी पेंच,
तुमने थामा था मेरा चेहरा
मेरी आँखों में झाँका था
मैं हर बात में हाँ भरा करता था
मैं अपने लफ़्ज़ों में रहा करता था
मगर मेरी परतें
मुझ पर जमी धूल
उखड़ने लगीं, हवा से
जहां मैं खड़ा था
वह जगह तुम्हारा फूल सा
भार न सकी संभाल
मैनें हम दोनों को ला गिराया
अंधियारे में,
तुम मुझे नहीं देख सकती अब
तुम मुझे छू भी नहीं पा रही
तुम आहत हो, खफा हो
तुम अब मेरे बनाये दलदल में
धंसी हो और रुकी हो निश्चल
कहाँ मैं और कहाँ तुम
और कहाँ अपना रस्ता गुम
पर रुको, मत थामो वो रस्सी
जो तुम्हें निकाल बाहर वापस
असलियत और बोझिलता की ओर
खींचती चली जाएगी
मैं भी तो हूँ यहीं तुम्हारे साथ
मुझे तुम दिखती चमकती हो
मेरे अपार अंधियारे में
देखो यहां भी बस मैं और तुम हैं
मेरा भी सब कुछ पीछे छूटा है
जो कुछ मुझमें कलुषित था
वह मुझसे टूटा है
अब दोनों धीरे धीरे
आंसू से कालिख धो लेंगे
इस गहरे गड्ढे से निकलने ही को
साथ हो लेंगे
वक़्त जो गुजरा वो गुजरा
जो गुजरेगा वो गुजरेगा
कल अगर गड्ढा था
कल को सीढी भी हो जाएगा
शायद चलते चलते
अपना रस्ता
दिख जाए कहीं
चार दिन चार पल
बीत जाएँ यूँहीं
आखिर  दोनों ही तो हैं यहां
इस जगह
इस निहायत अकेलेपन में
शायद नफरत और प्यार में
बहुत पतली दीवार है
चलते चलते लांघ पाओ
तुम शायद कभी
इसलिए अभी तुम मत जाओ
रुक जाओ, थम जाओ
टाल जाओ अपने कड़े और सही फैसले
मैं हक़ से नहीं
उम्मीद से मांगता हूँ
और वक़्त
और अकेलापन हमारा
और सन्नाटे
खिलखिलाहट के इंतज़ार में.





Tuesday, 13 May 2014

बाबा - 1

जब वो चलते थे तो पैर की मांसपेशियों से चटकने की हल्की आवाज़ आती थी, जिसे सुनकर कई बार मेरी नींद टूटती जब मैं अन्दर वाले कमरे में रजाई में दुबका रहता, या गर्मी में चटाई पर सोता  और बगल से वे गुजरते. केसला की गर्मियां तेज और लू वाली होती हैं, और कुछ साल पहले तक पंखा भी नहीं था, तो बाबा हमेशा उघाड़े बदन रहते दिन में, और सन की रस्सियों वाली खटिया के निशान उनकी पीठ पर चारखानेदार पड़ जाते.
जब भी बाबा घर पर होते तो मुझे और शिउली को पढ़ाते. गणित पढ़ाने में उनके जैसा सरल पढ़ाने वाला कोई नहीं मिला. अगर कोई ऐसी चीज़ होती जो उन्होंने अपने समय में नहीं पढी, कोर्स में नयी जुडी हो तो पहले उसे खुद पढ़ते फिर समझाते. व्यस्तता  बढ़ने के साथ पढ़ाना कम भी हुआ, लेकिन मुझे भी पढना हमेशा बोझ लगा, मांगने पर समय हमेशा देते थे. शिउली को कालेज के दिनों तक अर्थशास्त्र में मदद की.

सुबह तडके उठ जाते, और लिखने लगते, हम लोग रात (या भोर) समझ चार-पांच बजे पेशाब करने उठते तो बाबा पालथी मारे लिखते हुए दिखते, कभी लाईट न हो तो चिमनी की रोशनी में. लिखने की आदत जबरदस्त थी, चिट्ठियों के जवाब देते, प्लेटफार्म पर ट्रेन आने से पहले जल्दी जल्दी लिखते ताकि स्टेशन की डाक से जल्दी चली जाएँ. घर में पोस्टकार्ड इधर उधर मिलते हैं जिसमें उनके द्वारा 'जवाब- तारीख' लिखी होती है. हफ्ते में दो लेख सामान्यतः लिखते, उसके अलावा प्रेस विज्ञप्ति, पार्टी के परिपत्र वगैरह भी.

भूतकाल में लिखना कठिन है, मैं हमेशा से उनपर लिखना चाहता था, आज नहीं, आज से बीस साल बाद, जब मेरी लेखनी में इतनी ताकत आ जाये, जब मैं एक बेटे का अपने पिता के प्रति प्यार और आदर नहीं बल्कि उनके काम और विचारों के बारे में लिख सकूं. उनके जीवित रहते ही लिखना चाहता था हालांकि उन्हें पसंद नहीं आता. मैं समग्र में उनके जीवन और काम के बारे में लिखना चाहता था. लेकिन समग्र तो कोई नहीं लिख सकता. श्रद्धांजलि कैसी होती है? भाषण या लेख में नहीं होती, वो जैसी किशन पटनायक को जनपरिषद के जुझारू साथियों ने दी वैसी होती है.

उन्हें मेरी कवितायेँ पसंद आयीं थी, हालाँकि मैं उन्हें नहीं भेजता था, मेरा लिखना अपने दोस्तों, हमउम्रों, अपरिचितों के लिए होता है, जिन्हें मैं प्रभावित कर पाऊं. उनकी पसंद को मैनें अपने लिखे से अलग ही समझा. लेकिन शिउली और अन्य लोगों के जरिये उन तक पहुँची, और एक बार यहीं दिल्ली में मैनें एक सिरे से ब्लॉग की सारी कवितायेँ पढ़ कर सुनाई, जिस पर उनकी मिली जुली प्रतिक्रिया रही, लेकिन मुझे तसल्ली हुई. उन्हें गूढ़ता या शब्दजाल पसंद नहीं था, सीधी बात कहने वाली चीज़ें पसंद थीं. मेरी कविता किसी और के जरिये पहुँची और सामयिक वार्ता में छपी तो मुझे बहुत अच्छा लगा.

मैं ज्यादातर जगहों पर सुनीलजी - स्मिताजी का बेटा बना रहा. अपनी पहचान में भी और अंतर्मन में भी. अभी भी हूँ. अवचेतन में हमेशा याद रहा कि मैं कौन हूँ, हमेशा शर्म आयी कि जनरल डिब्बे, या वेटिंग लिस्ट में सफ़र करने से क्यों घबराता हूँ, या किसी कार्यालय के कर्मचारी से बहस न कर पाने की शर्म, महंगी दुकानों या रेस्तरां में घुसते हुए अपराधबोध जरूर होता है, और जीवन भर रहेगा, भले ही उसे दबा दिया जाए. ये चीज़ें हमारे लिए सामान्य हो गयी, मेरे आलस से बहुत खिन्न रहते थे,

बहुत कुछ याद आ रहा है, आगरा के किले और फतेहपुर सीकरी दिखाते हुए बहुत चाव से समझाया था कि कैसे मुगलों की स्थापत्य कला में ठंडक रहती थी, दीवारों में हवा के गलियारों के जरिये, और मेहराब में कैसे दरवाज़े मजबूत बनते हैं, कैसे बिना मसाले की जुड़ाई के मज़बूत पत्थर की दीवारें तैयार हो जाती हैं. बाबा नीरस - निर्मोही नहीं थे, उन्हें कभी कभार फ़िल्में देखने या जगहें देखने में आनंद आता था. लेकिन काम सबसे आगे था, और काम ही काम था, फुर्सत के क्षणों में किताबें पढ़ते और थ्योरेटिकल ज़मीन मज़बूत करते, कभी कभार फिक्शन भी पढ़ते लेकिन वह भी इधर कुछ सालों में ही शुरू किया था. मेरा अनुमान  यह है कि जब बाबा ने कार्यकर्ता बनने का तय किया तो 'शौक' उठाकर एक कोने रख दिए, हम उन्हें खींचकर कभी कभार फिल्म देखने ले जा पाए, कुल मिलाकर आधा दर्जन से ज्यादा बार नहीं. घूमते बहुत थे आन्दोलन और पार्टी के काम से, और आसपास के दर्शनीय स्थल समय मिलने पर देख लेते. पर निरंतर लिखना और लोगों से चर्चा करना, आन्दोलनों से जुड़ना, दौरा करना. यही उनके समय और सोच पर छाया रहता.

उनकी अपेक्षाएं सब से थीं, सब से, कोई भी छूटा नहीं है. सबसे यह अपेक्षा कि अपने समय का बड़ा हिस्सा समाज या समाजोपयोगी काम के लिए हम दें. लिखें, संगठन करें, गोष्ठियां करें, वार्ता को फैलाएं, या जहां भी हों अपने स्तर पर कुछ करें, अपने हाथ में चीज़ों को लें, परिस्थितियों के गुलाम न बनकर हिलाएं, झकझोर दें !
मुझे तेईस साल उनका साथ मिला, अब आगे जीवन में कितने साल हैं, यह साफ़ नहीं, लेकिन मुझे हमेशा अनकहा गर्व था बाबा पर, अनकहा इसलिए क्योंकि दिखाने पर उसका महत्त्व ख़त्म हो जाता, और हवाई गर्व की कोई कीमत भी नहीं. गर्व के आगे काम है, संघर्ष है. जिम्मेदारी है, उनका बेटा ही नहीं, उनका कार्यकर्ता होने की जिम्मेदारी ज्यादा बड़ी है. इस बैचेनी और ग्लानि  को काम में बदलना है कि उनके रास्ते पर अभी तक चल ही नहीं पाया हूँ. या अपना रास्ता भी बनाना शुरू नहीं किया है.
बड़ी तकलीफ के बावजूद लिख रहा हूँ, क्योंकि वो एक सार्वजनिक व्यक्तित्व थे, जिनका लिखा जाना जरूरी है, ताकि आगे हम बार बार मुड़कर देख सकें, खंगाल सकें एक जीवन को जो अनुकरणीय है/

Wednesday, 3 April 2013

सपनों की खेती

रात सरकती है पलकों पे बेआवाज़ 
बोल तैरते हैं हवा में बुलबुले 
कविता मगर छिटक जा गिरती है दूर 
हाथ लगाते ही यकायक 
अँधेरा चेहरा छुपाने के काम आएगा 
कसकर कम्बल सा लपेट लिए चलता हूँ इसे 
बेशुमार काम बाकी हैं 
कल,
और आज को लंबा खींच
नींद के खिलाफ मोर्चा खोले 
बुदबुदाता हूँ
अनगढ़ तुकबन्दियाँ
मेरी आँखों के सामने से
गुजरते हैं अनगिनत सपने
देखे जाते कमरों में, छतों के नीचे,
फुटपाथ पर,
नए बने फ्लाईओवर की ओट में
देखे जाते चुपचाप सपने
जहां ऊपर गुजरती तुम्हारी
मुश्किल से जुबां पे आते नामों वाली
विदेशी कारें,
उनके पहिये भी न कुचल पाते वसंत की रातों में तैरते सपनों को
(भले कुचला उन्होंने बार बार
देश के दोयम दर्जे के बाशिंदों को खुद )
रेल की पटरी के दोनों ओर
काली-नीली प्लास्टिक की झुग्गियों में से
मच्छरों की तरह भिनभिनाते बाहर आते सपने
रात में
जब दक्षिण दिल्ली की सड़कें,
मॉल, दुकानें, साउथ बॉम्बे, श्यामला हिल्स
या राजपथ-लुटियन की दिल्ली में भी
सपनों का प्रवेश निषेध नहीं करवाया जा सकता किसी
वर्दीधारी से,
वे निकल आते-नाचते गाते हैं सपने
फ़ैल जाते इस देश के काले आकाश पर रात में
मैं पढ़ने कि कोशिश करता हूँ इन्हें
या छोड़ देता यूं ही
गुम अपने सपनों में ही
और खुद को सांत्वना देता
'पाश' को भी..
अभी सपने जिंदा हैं,
सपनों की सीढियां बढ़ रही हैं
आसमान की ओर धीरे धीरे चुपचाप, दबे पांव
एक दिन सुबह होने पर भी वापस न उतरेंगे सपने
तब तक ढील दे रहा हूँ मैं
अँधेरे में बैठा कमरे में
और गुनता बूझता खेलता
सपनों से ..

Wednesday, 8 August 2012

बाढ़-टूरिज्म

देखा है किसी शहर को डूबते हुए?
चौखटों, आंगनों, दीवारों, 
किलकारियों, झल्लाहटों को 
'गड़प' से मटमैले पानी में 
गुम हो जाते देखा है?
सर पर बर्तन-भांडे, संसार
का बोझ लिए लड़खड़ाती औरतों को देखा है?
लाइन में लग बासी पुरियों और सड़े आलुओं की सब्जी
लेते स्कूल ड्रेस में खड़े बच्चे के कीचड खाए पैरों को देखा है?
देखा है गौमाता की सडती लाशों पर बैठे
कौओं की उत्साह भरी छीना-झपटी को?
आलआउट, एसी, से भगाए मच्छरों के झुण्ड को
रिलीफ कैम्प, बियांड बिलीफ कैम्प की ओर
कॉम्बैट फार्मेशन में बढते हुए देखा है?
देखा है उल्टी करते हुए बड़े गौर से
सरकारी अस्पताल के आँगन में
कोने में पडी पान की पीक को?
देखा है ऊपर मंडराते हेलीकाप्टर को,
उसकी खिड़की में से भोपाल से उड़कर आये
'किसान-पुत्र' को झांकते हुए देखा है?
नर्मदा के आवारा बेटे होशंगाबाद
का अपनी माँ के हाथों
गला घुंटते देखा है?
देखा है विकास को नंगा होते देखा है?
देखा है कल और आज को सरेआम लुटते देखा है?
चलो आज दिल्ली से दक्खिन की ओर
चलो आज आशा के अंतिम छोर
मोटरबोटों, तस्वीरों की चीखों के पार,
डूबती फसलों, तैरती गलियों के पार,
वादों, दावों, करिश्मों के पार,
भरम, मस्ती, मोहभंग के पार,
देखो क्या कोई बच पाता है,
देखो सामने कौन खिलखिलाकर
खींचे लिया आता है,
बाढ़, बाढ़, बाढ़.







(दिनांक 08-08-12 को जबकि होशंगाबाद में नर्मदा तबाही मचा रही है, और मैं/हम असहाय ख़बरें पढ़ रहे हैं, सन्न हैं, दिमाग कुंद है, तस्वीरें दो दिन पहले होशंगाबाद में ली गयी हैं )

Tuesday, 24 April 2012

अकेलेपन के मायने

अकेलेपन के मायने  

अकेलेपन के मायने कई होते हैं.. 
कुछ परिचित गानों का बार बार गुनगुनाना 
कुछ राह चलते खुद से बतियाना 
कुछ ताकना जाने अनजाने चेहरों को गौर से 
कुछ नजरें चुराना कईयों से 
कुछ भीड़ में भी गुम रहना 

कुछ डूबा रहना किताबों में, किस्सों में 
खयालों में, खयाली पुलावों में
रह रह कर उमडना-घुमडना,
बरसने का इंतज़ार करना,
बेमतलब मुस्कुराना सोच सोच
अपने ही चुटकुले,

अपनी आदतों में घुसते जाना-
जैसे कछुआ ढोता है
अपने ही पलायन की गुफा
अपनी पीठ पर,

झल्लाना-झुंझलाना आईने पर,

मुद्दई और गवाह खुद होना,
खुद ही जज बन अपने मुकद्दमों
को तारीख न देना हफ्ते दर हफ्ते,
तकरीरों औ मशवरों का कूड़ेदान होना,
महफ़िलों औ मेलों का सुनसान कोना,

कान उगाना,
मुंह सिलना,

अपने अकेलेपन से कहना
कि तू अकेला ही अकेला नहीं है,
कि अकेले अकेले ही
अकल आ जाती है,
कि आजादी अकेलापन है,

खैर,
अकेलेपन के मायने भी
अकेले बैठे ही समझ आते हैं..

Wednesday, 11 April 2012

कहने दो उन्हें जो यह कहते हैं...



आजकल बाज़ार में टूथपेस्ट के नए विज्ञापनों का चलन है.. जो दावा करते हैं कि वे आपके दांतों की 'सेंसेटीवीटी'
याने संवेदना खत्म कर देंगे.. याने ठंडा-गरम खाने-पीने से होने वाली तकलीफ/अहसास खत्म हो जाएँगे. जैसा कि चलन है, एक के बाद और कंपनियों ने भी यह फार्मूला अपना लिया, जैसा कि पुरुषों के गोरेपन की क्रीम से लेकर अभी तक चला आ रहा है. एक कंपनी अपनी तथाकथित मार्केट रिसर्च के बाद जो शिगूफा छोडती है, वो आग की तरह सारे दिमागों तक पहुंचाया जाने लगता है. यह नहीं कि आप ठंडा-गरम कम खाएं और दांतों का ख़याल रखें. उनकी संवेदना ही कुंद कर दी जाएगी..

लेकिन मैं रिमूव सेंसेटीवीटी.. की 'कैचलाइन' सुनकर सोच में पड़ गया. मुझे समझ में आने लगा कि यह सिर्फ दांतों का मामला नहीं है, दरअसल हर किस्म की संवेदनशीलता को खत्म करने का अभियान जारी है.

भावों, खासकर सहानुभूति, पीड़ा, ग्लानि -जैसे तथाकथित 'नकारात्मक' भावों को दबाने के लिए जनाब श्री श्री से लेकर तमाम बाबाओं की दुकानें चलती हैं. कोई माने या न माने.. लेकिन यह इंसान का एक मूल स्वभाव है, कि वो औरों के दुःख से दुखी, द्रवित होता है, साथ ही यह सोचने पर भी मजबूर होता है, कि आखिर क्या कारण है कि इतने लोग इतने बुरे हालत में जी-मर रहे हैं.

लेकिन यह ज़माना देखकर भी न देखने का ज़माना है, इसीलिए सालों से शहर के बीच में रह रहे मजदूरों-कारीगरों की झुग्गियों को अस्सी के दशक से ही उठाकर शहर से बाहर फेंका जाने लगा, ये कालोनियां 'अवैध', 'गंदी', अपराधियों का अड्डा या फिर विकास का अवरोध आदि कई कई नामों से हटाई गयी.. वहीं बिल्डरों के अवैध निर्माण चुपचाप वैध हो गए.. रेसिडेंट वेलफेयर असोसिएशन वगैरह की त्रासदी को मीडिया में भी जगह मिली, पर पिछले दिनों से देखता हूँ कि झुग्गियां तभी सुर्ख़ियों में आती हैं जब वहाँ आग लगती है, जहरीली शराब पीकर लोग मरते हैं या फिर लाठी चार्ज/पथराव होता है.

सौन्दर्यीकरण या शंघाईकरण का मतलब बस यही है कि कांक्रीट के जंगलों में गिने चुने इंसान बचें जो काले शीशों में बंद ठंडी हवा खाते रहें, और उनके गुलाम हमेशा परदे के पीछे रहें.. अदृश्य, मानो किसी आधुनिक मशीन के पुर्जे.. जो बोनट में बंद हैं..

दिल्ली में अस्सी के एशियाड में बड़े पैमाने पर बस्तियों को उजाडा गया.. फ्लाईओवर बने जो जल्द ही बढती कारों के बोझ तले कम पड़ गए.. मजदूर सुबह शाम खचाखच भरी बसों में लथपथ दो तीन घंटे सफर कर काम करने जाते और लौटकर अपने दस बाय बारह के दडबे में सो जाते, जहां पानी,शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी चीज़ों के भी सपने ही पाए जाते. इस तरह शहर का वो थोड़ा बहुत आम चेहरा टूटा जो पुरानेपन की पहचान था, जब गरीब भी अमीर के मोहल्ले में दुआ-सलाम कर रहा करता था, ये आधुनिक अपार्थाइड था.. अब शहर खास थे.. शहर के कुछ हिस्से खास थे. जहां कृष्णों को सुदामा पर मेहरबानी करने की भी जहमत नहीं उठानी पड़ती थी. सुदामा को अपहरण कर गायब कर दिया गया ताकि कृष्ण की मौज में खलल नहीं पड़े..

अभी कामनवेल्थ खेलों में तो सरकार ने झुग्गियों के सामने बड़े बड़े परदे-होर्डिंग लगवा दिए, ताकि हमारे नफीस मेहमानों को हमारे जाहिल देशवासी दिखाई न पड़ें, ताकि महाशक्ति बनाने के ख्वाब पर फटे तलवों, पसीने और निराश निगाहों के दाग न लगें, ताकि दक्षिण दिल्ली की चिकनी सड़कों पर दौडती लक्झरी कारों और पंचसितारा होटलों में मयनोशी करते अमीरजादों में ही हिन्दुस्तान की परछाई नुमाया हो. यह बात अलग है कि इन खेलों को देखने कोई आया ही नहीं और इस बहाने बहुत से होटल वालों को सस्ती ज़मीन मिल गयी.

तो यह तय है कि हमारे समय में संवेदना की जरूरत और अस्तित्व को खत्म करने की पुरजोर कोशिश जारी है, डाक्टर और बाबा सलाह देते हैं कि हमेशा खुश रहो, पाजीटिव सोचो, बल्कि सोचो ही मत तो सबसे अच्छा.. अपने घर-दफ्तर और बाजार में बस अगले प्रमोशन, अगली छुट्टी, अगले मोबाइल, अगली फिल्म, अगले चुटकुले का इंतज़ार करो. अगर सड़क पर, गली में, फुटपाथ पर या बस की खिड़की से कुछ ऐसे लोग दिखाई पड़ जाएँ जो कुछ अजनबी से हों, जिन्होंने ब्रांड के कपडे नहीं पहने हों, या जो खिली खिली क्रीम छाप त्वचा के मालिक नहीं हों, जिनकी आँखों में अभी भी कमरे के किराए और माँ की बीमारी और गाँव की फसल की चिंता हो, तो समझ लो कि वह सीनरी का हिस्सा है, बल्कि वह तुम्हारे मनोरंजन-विविधता के लिये ही वहाँ खडा किया गया है. कि वो जहां हैं वहीं खुश है, कि वे उसी लायक है, कि उनकी किस्मत में वही लिखा है, कि वो इसीलिए नहीं मुस्कुराते क्योंकि वे कोलगेट नहीं कोयले से दांत मांजते हैं. कि वे इंसान नहीं खच्चर हैं..

जी हाँ यह संवेदनाओं का कब्रिस्तान है मेरा देश, यह समय छोटी याददाश्त और टुच्चे सपनों का समय है. जब कानों में हेडफोन लगे हैं और चीख-पुकार सुनाई नहीं देती, न ही खौफनाक मंज़र दिखाई पड़ते हैं फैशनेबुल धुप के चश्मों में. पांच हज़ार लोग भूख हड़ताल पर बैठते हैं, जो देशद्रोही हैं, जो विकास विरोधी हैं, जो 'एंटीला' जैसे बंगलों को बिजली देने के लिए अपने भविष्य की कुर्बानी देने को तैयार नहीं हैं..

नोंनाडांगा में माँ माटी और मानुष वाली नेत्री.. उक्त तीनों पर हमला करती है, दो सौ बेघर परिवार, जो अपनी तारपलीन की झुग्गियों में तूफ़ान से उजड जाने के बाद रह रहे थे.. उजाड दिए जाते हैं, यकायक, उनके पास कागजात नहीं है, लेकिन उससे भी बड़ी बात यह कि वो अमीर-जात नहीं हैं.. वो रिक्शा खींचने, बर्तन मांजने, ईंट धोने वाले हाथ हैं, वो 'हीरा है सदा के लिए ', पहनने वाले और वैक्सिंग करवाने वाले हाथ नहीं हैं. कुछ हाथ और भी उठे इनका साथ देने को.. लेकिन हथकडियां अब तैयार बैठी हैं, क़ानून बन चुके हैं.. जो हाथों को उठने से रोकते और सलाम करने पर मजबूर करते हैं.

मुझे ठंडा-गर्म महसूस होता है अब भी, मेरी रगें सनसना उठती हैं.. मैं हर एक को झकझोर कर कहना चाहता हूँ, ऐसा टूथपेस्ट-क्रीम मत लगाना कि, किसी उजड़ते हुए परिवार को देखकर रोना न आये, कि किसी पिटते हुए मजदूर को देखकर गुस्सा न आये, कि किसी लड़ते हुए किसान को देखकर प्रेरणा न मिले .. ऐसे मत बन जाना कि हमारे सामने ये देश, समाज, लोग खत्म किये जाते रहें.. कि न्याय, समता, इंसानियत सब विज्ञापन बन कर रह जाएँ जो चमकती दीवारों पर सजे हों, जिनके नीचे लाशों पर बाजार के फूल खिलें हो, और हम खड़े शून्य में ताकते रहें या मौज मनाते रहें. अभी भी समय बाकी है, अभी भी लड़ाई जारी है..
मुक्तिबोध के शब्दों में -
इतना गूढ़, इतना गाढ़, सुंदर-जाल –
केवल एक जलता सत्य देने टाल।
छोड़ो हाय, केवल घृणा औ' दुर्गंध
तेरी रेशमी वह शब्द-संस्कृति अंध
देती क्रोध मुझको, खूब जलता क्रोध...

फोटो नोनाडांगा के विस्थापितों की एक तस्वीर है जो 'डाउन टू अर्थ' पत्रिका से ली गयी है,

Thursday, 5 April 2012

गाँवों-कस्बों के लोग

गाँवों-कस्बों के लोग

इंग्लिश सुन सुन कुछ घबराते
गाँवों-कस्बों के लोग
तेल चुपड़कर बाल बनाते
गाँवों कस्बों के लोग,
हरदम गर्दन खूब घुमाते
गाँवों-कस्बों के लोग.
इधर घूरते उधर ताड़ते
सब कुछ नया नवेला पाते.
खुद को निपट अकेला पाते
दौलत पर पलकें झपकाते
गाँवों कस्बों के लोग.
दृश्य नया संसार नया है,
ये शहरी दरबार नया है,
निर्मम कारोबार नया है
इज्जत का आधार नया है,
देश नया ये भेष नया है
काले गोरे बन बैठे हैं
गोरे मन-दर-मन बैठे हैं
मॉल में जा और कॉफी पी
ढाबा है नाकाफी, पी !
हाथ हिला हिला कर बोल
यू आर वेरी गोल मटोल,
बातें हो सिंगापुर की
यूएस की शंघाई की
देश की हों भी अगर
मानो हो अजायबघर,
सुन सुनकर बहुत चकराते
गाँवों कस्बों के लोग.
बातचीत में बोलचाल में
रंग-ढंग में देखभाल में
अपना -सा कुछ न मिलने पर
अपनी हालत पर झुंझलाते
गाँवों कस्बों के लोग,
शायद यही तो नियति है
जो थोथा है -वो प्रगति है
बिक न सके जो, माल बुरा है
हम जैसों का हाल बुरा है,
अक्षम चिंताओं को ढोते
गाँवों-कस्बों के लोग,
वे जो मदमस्त हो लोटें
'मैं' की धुन में अमृत घोंटें
जिनका जीवन स्वर्णजडित है
फिर भी जो सौंदर्य रहित है
धीरे धीरे खुद को खोते
'उनके' जैसा होते होते
इक दिन खुद को कहीं न पाते
गाँवों कस्बों के लोग.