Friday, 9 February 2018

कितने काम

कितने तो काम
अटके पड़े हैं 
घर-धाम 
आंवले में फल नहीं आते
छत में खपरैल दरक गयी हैं
दरवाजों पर रंग की पपड़ियाँ
उखड़ने लगी हैं
पड़ोस के बच्चे बड़े हो गए
अपरिचित ही रहकर
अब तो सकुचाकर मुस्कुरा जाते हैं
नंग-धडंग जिनको डांटा था
अमरुद पर कंकर मारने पर
यात्राएं जमा होती गयी
जैसे संस्मरणों की फेहरिस्त
दिमाग के किसी कोने में
दोस्त रह गए परे
या मिलकर भी न मिले
खुलकर
निरंतर वर्तमान धकेल चला
कितनी कीमती चीज़ों को अतीत में
न सीखी सिलाई
या बनाना कोई अलग सी चटनी
सीखना उर्दू
मांझना बांग्ला
अंत में बचा, या बचेगा क्या
घंटों अन्यमनस्क ढंग से
किया गया "उत्पादन"
जो खप गया सभ्यता की मशीन में
और टीस
कि साइकिल नहीं सुधरवाई
कि मेला नहीं देखा
कि नहीं लिखी
दुनिया की सबसे जरूरी किताब.

(19 जनवरी 2018)

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